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शेखर गुप्ता का कॉलम:दंगों के कारणों पर बात करना जरूरी है

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माल्टा में जन्मे अमेरिकी कार्टूनिस्ट जो सैको ने अपने अनूठे ‘कॉमिक्स जर्नलिज्म’ के बूते दुनिया भर में तो लोकप्रियता हासिल की ही है, अपने भारी-भरकम बायोडाटा में उन्होंने अपनी सबसे ताजा किताब ‘द वंस एंड फ्यूचर रायट’ के रूप में एक और उपलब्धि जोड़ ली है। लेकिन प्रकाशक ने इस किताब को वितरण से रोक लिया है। आखिर, यह 2002 के गुजरात दंगे के बाद हुए सबसे बड़े मुजफ्फरनगर दंगे के बारे में जो है। आइए, पहले तथ्यों पर नजर डाल लें। भारत में किताबों पर कभी-कभार प्रतिबंध लगाने का दुखद इतिहास रहा है। लेकिन सैको की किताब पर सरकार ने प्रतिबंध नहीं लगाया है। प्रकाशक ने ही यह कदम उठाया। उसने किताब को रोककर कुछ संशोधन करने के सुझाव देते हुए पांच पेज का एक नोट भेजा था, जिसे सैको ने खारिज कर दिया। अब कई दूसरे भारतीय प्रकाशक सैको से संपर्क करने की कोशिश में जुटे हैं। सैको का कहना है कि वे चाहते हैं किताब भारतीय पाठकों तक पहुंचे। 144 पेज की इस किताब में कॉमिक्स-पत्रकारिता के उस्ताद सैको ने अपने शानदार स्केचेस के माध्यम से एक जटिल कहानी कह दी है। टेक्स्ट केवल ‘ब्लर्ब्स’ में दर्ज है, जिसे पढ़ने में दो घंटे से ज्यादा नहीं लगेंगे, बशर्ते आप उनके रेखाचित्रों से सम्मोहित न हो जाएं और चित्रों तथा चेहरों के जरिए कही गई कहानी में खो न जाएं। किताब पर रोक नहीं लगाई गई है, और कोई भी कानून किसी भी किताब को पढ़ने से नहीं रोकता। सैको ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे की जो कहानी कही है, वह सीधी, मुख्यतः एक रेखा में चलती है, तथ्यपूर्ण है और भारतीय पत्रकारिता में सैकड़ों नहीं तो कई बार कही जा चुकी है। किताब में कोई आश्चर्यजनक बात नहीं कही गई है, कोई नया खुलासा नहीं किया गया है और न बढ़ा-चढ़ाकर कुछ कहा गया है। सैको ने भारतीय संदर्भ के मद्देनजर दंगे को ‘छोटा’ ही बताया है। आखिर सैको ने इस पर एक पूरी किताब क्यों लिखी है, जबकि बोस्निया और गाजा में जनसंहार और कत्ल-ए-आम पर लिखी कृतियां उन्हें खूब प्रसिद्धि और पुरस्कार दिला चुकी हैं? जिस दंगे को वे ‘छोटा’ बता रहे हैं, जिसमें 42 मुसलमान और 20 हिंदू समेत कुल 62 लोग मारे गए, उसमें उनकी इतनी दिलचस्पी क्यों जगी? नई दिल्ली से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर दंगे में 62 लोगों का मारा जाना बेशक कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन आप चाहें या न चाहें, साम्प्रदायिक दंगों के आकार का भी एक पैमाना बन गया है। सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से बारीक है लेकिन कहा जा सकता है कि कुछ मामलों में वे चूक गए हैं। उदाहरण के लिए, उनकी यह समझ कि बंटवारे के दौरान हुई भारी मार-काट के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद ही हुए। जबकि गुजरात में ही दंगों का 1992 से पहले का भी इतिहास रहा है, खासकर 1969 में अहमदाबाद दंगे में 512 लोग मारे गए थे। बड़े आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। साम्प्रदायिक हिंसा पर शोध वार्ष्णेय-विलकिंसन डेटासेट पर आधारित रहे हैं। यह डेटासेट ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय और येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीवेन विलकिंसन के नाम पर स्थापित है। इसमें भारत में 1950 से 1995 के बीच हुए 1,194 उल्लेखनीय साम्प्रदायिक दंगों के आंकड़े दर्ज हैं। इनमें से 72 फीसदी यानी 871 दंगे नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी की सरकारों के कार्यकाल में हुए। भारत में साम्प्रदायिक दंगों का सिलसिला बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद नहीं शुरू हुआ, लेकिन विडम्बना यह है कि सैको ने इस तर्क को मान लिया। साम्प्रदायिक दंगों के रूप में हमारी राष्ट्रीय शर्म के बारे में और ज्यादा जानना है तो ‘पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर’ की वेबसाइट पर ‘अ फैक्टशीट ऑन कम्युनल रायट्स’ को भी देखें। लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें, जिस पर सैको ने जोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं, लगभग नेतृत्व विहीन और शुरू में राजनीति से मुक्त भीड़ हावी हो जाती है। मौके का फायदा उठाकर सियासतदां और सिद्धांतकार भी कूद पड़ते हैं। सैको बताते हैं कि मुजफ्फरनगर में यही हुआ। वे यह भी याद दिलाते हैं कि उस समय कमान किसके हाथ में थी। तब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में उनके पिता मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार थी और देश की कमान यूपीए की सरकार के हाथ में थी। दोनों ‘सेकुलर’ ताकतें! बाबरी विध्वंस (1992) और गुजरात दंगों (2002) के बाद सार्वजनिक बहसें जिस कदर ध्रुवीकृत हो गई हैं, उसके मद्देनजर कभी-कभी तीखी विदेशी नजर आपको ज्यादा साफ तस्वीर दिखा देती है। सैको बताते हैं कि मुजफ्फरनगर में छिटपुट घटनाओं को किस तरह हल्के से लिया गया, जैसे एक मुस्लिम लड़की के दुष्कर्म और हत्या की कोशिश; एक हिंदू लड़की को परेशान करने के शक में एक मुस्लिम लड़के की हत्या और बदला लेने के लिए हिंदू समूह के दो चचेरे भाइयों की हत्या; जाटों के एक जुलूस पर मुस्लिम भीड़ का हमला; ऐसी सभी घटनाओं को गम्भीरता से नहीं लिया गया। सैको बताते हैं कि दो लड़कों की हत्या के मामले में पुलिस ने कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया, जिनकी कमीजों पर खून के दाग थे। उन सभी को अगली सुबह रिहा कर दिया गया और एसएसपी तथा जिला मजिस्ट्रेट का तबादला भी कर दिया गया। सैको ने लिखा है यूपी के जाटों को यह मुसलमानों को संतुष्ट करने की कोशिश लगी होगी। सैको ने ‘दि फ्यूचर रायट’ (भविष्य का दंगा) शीर्षक से 17 पेज में जो निष्कर्ष दिया है, उसमें उन्होंने लिखा है कि दंगों ने बीजेपी को उस राज्य में 2017 और 2022 के चुनावों को जीतने में मदद की। लेकिन कोई भी सरकार ऐसी बातें कहने वाली किताब पर प्रतिबंध नहीं लगाएगी। ऐसी बातें तो पिछले एक दशक में प्रकाशित दो दर्जन किताबों में पाई जा सकती हैं। हां, प्रकाशक का यह कहना सही है कि किताब में भारत का जो नक्शा दिया गया है, उसे प्रकाशित करना कानून का उल्लंघन होगा। लेकिन हर कोई ऐसे मामलों से निपटना जानता है। विदेशी प्रकाशनों में ऐसे नक्शों पर मुहर लगाई जाती है कि यह गलत है, या उन्हें हटा दिया जाता है। लेकिन इसे बहाना बनाकर किसी किताब को न वितरित करना क्रूर मजाक ही होगा। स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा है
गुजरात में ही दंगों का 1992 से पहले का भी इतिहास रहा है, खासकर 1969 में अहमदाबाद दंगे में 512 लोग मारे गए थे। बड़े आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। वार्ष्णेय-विलकिंसन डेटासेट में भारत में 1950 से 1995 के बीच हुए 1,194 साम्प्रदायिक दंगों के आंकड़े दर्ज हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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