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रीटा कोठारी का कॉलम:चीजों के पूरा होने और उनके धीरे-धीरे खुलने में फर्क है

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‘प्यार’ कोई भौतिक चीज नहीं है। इसलिए जब हम ‘आधा इश्क’ या ‘हाफ लव’ कहते हैं, तो इसका क्या अर्थ होता है? जब प्यार या इश्क ‘आधा’ होता है, तो क्या वह पहले पूरा था और फिर आधा हो गया, या वह पूरा होने की राह पर है पर अभी पूरा नहीं हुआ? फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ (2010) का गाना याद आता है : ‘नमकीन सी बात है हर नई सी बात में, तेरी खुशबू चल रही है जो मेरे साथ में, हल्का-हल्का रंग बीते कल का गहरा-गहरा कल हो जाएगा, आधा इश्क आधा है आधा हो जाएगा, कदमों से मीलों का वादा हो जाएगा…।’ कभी-कभी कदमों में एक नई फुर्ती होती है और हवा में उम्मीद-सी महसूस होती है। हो सकता है कोई खास सम्भावना अभी दूर हो, लेकिन उसके बारे में सोचना ही सुखद लगता है। हो सकता है यह प्यार न हो, या शायद किसी तरह से हो भी। यह ऐसा सुखद विचार है, जो छोटे-छोटे कदम उठाने और उन्हें एक खास दिशा में बढ़ते देखने की इच्छा जगाता है। यह खुद को या किसी और को जानने या समझने की बात नहीं है, बल्कि मन-मिजाज में एक ऐसी हल्की-फुल्की खुशी है, जो शायद कल किसी बड़ी चीज की बुनियाद बन जाए। यह प्यार की ओर एक धीमी और सुकून भरी चाल है। जब प्यार अधूरा लगता है तो किसी पक्के यकीन के बजाय एक सुखद सम्भावना पर टिका होता है। इस गाने का आधुनिक अंदाज इसी बीच के पल को रचने में है- प्यार न करने और प्यार करने के बीच; बेपरवाह या तटस्थ या फिर लेन-देन वाले रिश्ते और पूरी तरह से खुद को सौंप देने की चाहत के बीच। यह एक नई, अनजानी और आकर्षक चीज की ओर धीरे-धीरे बढ़ने का एहसास कराता है- ऐसा आकर्षण, जिसे परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन जो डरावना भी नहीं है। यह आज का ‘आधा प्यार’ है; बाकी आधा शायद कल हो। शुरुआत में इसके रंग हल्के थे, लेकिन हो सकता है कल वे और गहरे हो जाएं। एक स्थिति से दूसरी स्थिति तक पहुंचने के लिए क्या चाहिए? यह गाना कमिटमेंट जैसे शब्दों से बचता है। यह रिश्ते या इंसान के बजाय समय पर भरोसा रखने का संकेत देता है। बेशक, जिस इंसान से प्यार हो सकता है, उससे इतनी उम्मीद तो है कि यह सफर आगे बढ़े और चाहने लायक बने; लेकिन अभी यह कोई पक्का या तय हो चुका मामला नहीं है। वह अनकहा, अनसुना शब्द है- इत्मीनान। धीरे-धीरे। अपने सही समय पर।
इस नजरिए से देखें तो यह गाना प्यार से ‘पहले’ का है, या प्यार की ओर बढ़ते सफर का। इसमें उम्मीद तो है कि रिश्ता पूरा होगा, लेकिन उसके लिए बेचैनी नहीं है। यह सबूतों नहीं, संभावनाओं पर टिका है। इसलिए, अभी कोई पक्का वादा करना जल्दबाजी होगी, और शायद ऐसा करना अब पुराना भी हो चुका है। इस पल में जो बात मायने रखती है, वह है एहसास का ताजापन और जोश। कदम भले छोटे हों, पर उनमें हिचकिचाहट नहीं है, और मंजिल भले धुंधली हो, पर सफर बुरा नहीं है। यहां ‘आधा’ शब्द के इर्द-गिर्द बहुत कुछ बुना गया है- एक ऐसी बात जो ईमानदारी भरी है और जिसमें कोई हड़बड़ी नहीं है। यह ‘आधा’ किसी कमी की कहानी नहीं है कि कोई दूसरा आधा हिस्सा खो गया है और इसलिए कुछ अधूरापन है। बल्कि, यह उस हिस्से को दिखाता है, जो अभी मौजूद है, और उसका होना ही इस उम्मीद के लिए काफी है कि आगे चलकर और भी कुछ हो सकता है। यह किसी पूरी चीज का गणितीय आधा हिस्सा नहीं है, बल्कि चीजों के धीरे-धीरे खुलने और आगे बढ़ने को मंजूरी देना है। वी. शांताराम की ‘नवरंग’ (1959) में भी दिवाकर ने अपने लिए मोहिनी नाम की एक प्रेमिका (म्यूज़) की कल्पना की है, जो बिल्कुल उनकी पत्नी जमना जैसी दिखती है। मोहिनी में उन्हें वह साथी मिल जाता है, जो जमना नहीं बन पातीं; इस कल्पना के जरिए वे अपनी कविताओं और शारीरिक इच्छाओं, दोनों को पूरा करते हैं। मोहिनी असल में मौजूद नहीं होकर भी किसी चाहत के पूरे होने का एहसास कराती है; लेकिन गाना उन्हें यह भी याद दिलाता है कि असल जिंदगी में सब कुछ पूरा नहीं होता। इच्छा पूरी होने और अधूरापन महसूस होने के बीच की खींचतान पर आधारित है गाना- ‘आधा है चंद्रमा…’ यह लेख शब्दों की सीमा पार कर जाए, उससे पहले इसे आधा ही छोड़ दें- शायद फिर भी लुत्फ बरकरार रहे। जिस इंसान से प्यार हो सकता है, उससे इतनी उम्मीद तो है कि यह सफर आगे बढ़े और चाहने लायक बने; लेकिन अभी यह कोई पक्का या तय हो चुका मामला नहीं है। वह अनकहा, अनसुना शब्द है- इत्मीनान। धीरे-धीरे। सही समय पर।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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