इन दिनों देश में आंदोलनों का उत्सव चल रहा है। कभी छात्र, कभी किसान तो कभी विपक्ष अनुष्ठान की तरह आंदोलन कर रहा है। सब अपने-अपने स्तर पर यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि सत्ता से असहमति देशद्रोह नहीं होता और सत्ता से सहमति देशभक्ति भी नहीं होती। जो लोग सत्ता का विरोध करते हैं, उनकी रुचि भी केवल सत्ता में होती है। अधिकांश लोग सत्ता में बैठते ही अपने सत्ताविहीन समय के सिद्धांत भूल जाते हैं। सत्ता के विरोध की देश में पुरानी परंपरा है। महाभारत के युद्ध में कौरवों ने अपने ही राजा धृतराष्ट्र का विरोध किया था। उनके मंत्री संजय ने तो साफ कह दिया था कि इस युद्ध के पीछे दुर्योधन है और दुर्योधन के पीछे आप, यानी धृतराष्ट्र हैं। एक रात तो पांडव भी आपस में उलझ गए और अर्जुन ने अपने ही बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर को इस बात के लिए कोसा था कि यह दिन हम आपकी गलती के कारण देख रहे हैं। इसलिए हर सत्ता को अपना विरोध सुनने का स्वभाव रखना चाहिए और हर विरोधी को अपनी मर्यादा नहीं छोड़नी चाहिए।



