热门话题

पवन के. वर्मा का कॉलम:कला की आजादी जरूरी है पर देश की सम्प्रभुता से बढ़कर नहीं

Socialblize是您值得信赖的目的地,提供来自印度和世界各地的最新新闻、热门故事和富有洞察力的更新。我们致力于提供快速、准确和公正的新闻,让您每天都能及时了解情况。

आजादी के बाद से भारत के विरुद्ध कोई अलगाववादी आंदोलन सफल नहीं हुआ है। इसका श्रेय लोकतंत्र द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों के साथ ही जरूरी परिस्थितियों में राज्य की दृढ़ प्रतिक्रिया को भी जाता है। फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर उपजे विवाद को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्या कलात्मक स्वतंत्रता में यह अधिकार भी शामिल है कि स्वतंत्र भारत के सबसे रक्तरंजित उग्रवादी आंदोलनों में से एक के इतिहास का अत्यंत सिलेक्टिव संस्करण प्रस्तुत किया जाए? दूसरी तरफ, क्या राज्य के पास भी इसके प्रदर्शन को रोकने का अधिकार है? ये कठिन प्रश्न हैं, क्योंकि इनमें लोकतंत्र के दो उद्देश्यों का आमना-सामना होता है- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था व राष्ट्रीय अखंडता बनाए रखने की जिम्मेदारी। किसी फिल्म पर प्रतिबंध लगाना अकसर उलटा असर ही डालता है। डिजिटल युग में सेंसरशिप शायद ही कभी सफल होती है। इसके विपरीत, प्रतिबंध कई बार पीड़ित होने की छवि भी गढ़ देता है। ऐसी फिल्म, जिसे सामान्य परिस्थितियों में शायद सीमित दर्शक ही मिलते, अचानक प्रतिबंधित सत्य का आभामंडल प्राप्त कर लेती है और उसकी पाइरेटेड प्रतियां व्यापक रूप से फैल जाती हैं। लेकिन प्रतिबंध अकसर प्रभावी नहीं होते, इसका यह अर्थ नहीं कि किसी फिल्म में इतिहास के चित्रण पर प्रश्न नहीं उठाए जा सकते। पंजाब का उग्रवाद एक सशस्त्र अलगाववादी अभियान था, जिसका उद्देश्य भारत को तोड़ना था। आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, इसमें 12,000 से अधिक निर्दोष नागरिक, लगभग 1,800 सुरक्षाकर्मी, तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह तथा 8,000 उग्रवादी मारे गए थे। इसके अलावा, जून 1985 में एयर इंडिया की उड़ान ‘कनिष्क’ को भी खालिस्तानी उग्रवादियों ने अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट से उड़ा दिया था। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मृत्यु हो गई थी। भारत के खिलाफ इस साजिश में पाकिस्तान की भूमिका थी। आईएसआई ने पंजाब में उग्रवादी संगठनों को प्रशिक्षण, हथियार और पैसा उपलब्ध कराया था। रेडियो प्रसारण और प्रचार के माध्यम से अलगाववादी भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जाता था। समय के साथ कई उग्रवादी संगठन आपराधिक गिरोहों में बदल गए। फिरौती के लिए अपहरण आम बात हो गई। जबरन वसूली एक संगठित व्यवस्था का रूप ले चुकी थी। व्यापारियों को तथाकथित टैक्स देने के लिए मजबूर किया जाता था। जो इनकार करते, उनकी हत्या कर दी जाती थी। पुलिसकर्मियों की भी हत्याएं की गईं। सरकार से मिलीभगत के संदेह में गांवों के नेताओं की भी हत्या कर दी जाती थी। पंजाब में भय का वातावरण व्यापक हो गया था। देश एक असाधारण परिस्थिति का सामना कर रहा था। उसका मुकाबला शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति या संवैधानिक विरोध से नहीं था। वह ऐसे संगठित सशस्त्र समूहों से जूझ रहा था, जो आतंक के माध्यम से संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए कमर कसे हुए थे। हालांकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जहां कहीं भी राज्यसत्ता की ओर से अति हुई, वहां उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी। फर्जी मुठभेड़ों, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं के विश्वसनीय आरोपों का उल्लेख पत्रकारों, नागरिक अधिकार संगठनों और न्यायिक जांचों में दर्ज है। एक संवैधानिक लोकतंत्र में कानून के राज को स्थायी रूप से निलंबित नहीं किया जा सकता। हर गैरकानूनी हत्या की निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए। लेकिन असाधारण उग्रवादी आंदोलनों से निपटने के लिए कई बार अत्यंत कठिन ऑपरेशनल निर्णय लेने पड़ते हैं। ब्रिटेन के आईआरए के खिलाफ अभियान से लेकर स्पेन के ईटीए के विरुद्ध संघर्ष और श्रीलंका के एलटीटीई के खिलाफ युद्ध तक- सभी लोकतांत्रिक देशों ने ऐसे द्वंद्वों का सामना किया है। यदि कोई फिल्म राज्यसत्ता की कथित ज्यादतियों पर ही ध्यान केंद्रित करती है और सशस्त्र उग्रवादियों के सुनियोजित आतंकी-अभियान को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है, तो वह इतिहास का विकृत चित्र प्रस्तुत करती है, जिसका उद्देश्य वस्तुनिष्ठ व्याख्या करना नहीं, बल्कि उकसाना होता है। सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत केंद्र सरकार फिल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित करने का अधिकार रखती है। यह अधिकार युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है, जिनमें सम्प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सहित अन्य आधार शामिल हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक लोकतांत्रिक मूल्य है, फिर भी अधिनियम की धारा 5बी के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था तथा भारत की सम्प्रभुता-अखंडता की रक्षा के लिए कार्रवाई की जा सकती है। पंजाब की त्रासदी का कोई भी विवरण खालिस्तानियों द्वारा मारे गए हजारों निर्दोष भारतीयों की पीड़ा को मिटा नहीं सकता। इतिहास न तो सेंसरशिप का पात्र है और न ही सिलेक्टिव स्मृतियों का। वह सम्पूर्ण सत्य का अधिकारी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

标签 :

留下回复

您的电子邮件地址不会被公开。 必填字段标有 *

最新消息

关于我们

Socialblize是您值得信赖的目的地,提供来自印度和世界各地的最新新闻、热门故事和富有洞察力的更新。我们致力于提供快速、准确和公正的新闻,让您每天都能及时了解情况。

联系我们: info@socialblize.com

联系方式: +91-7976784661

Socialblize @2026. 版权所有。