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शिव्या नाथ का कॉलम:जंगल की संतानों से सीखना चाहिए जीवन का तालमेल

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मैंने छत्तीसगढ़ को कई मिली-जुली, धूप-छांही भावनाओं के साथ विदा कहा था। इस राज्य में मैंने लगभग दो सप्ताह बिताए थे। इस दौरान वहां मैंने देर रात, साल के घने जंगलों में मोटरसाइकिल से यात्रा की थी। चांदनी में चमकते सफेद, झड़ चुके पत्तों वाले भुतहे पेड़ एक विचित्र दृश्य प्रस्तुत करते थे। दूरस्थ आदिवासी बस्तियों तक पहुंचने के लिए मैंने बहती नदियों को पार किया। बस्तर और कवर्धा की अपनी यात्रा के दौरान मैं जंगल के भीतर गोंड जनजाति के एक ऐसे गांव में रही, जो बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी पूरी तरह से वंचित था। नक्सल प्रभाव वाले इस चिह्नित क्षेत्र में मैं अपने मेजबान परिवार के साथ अलाव के समीप बैठी और आदिवासी जीवन से जुड़ी जटिलताओं तथा उसके बारे में प्रचलित भ्रांतियों को समझने का प्रयास किया। मैंने धुरवा जनजाति के पारम्परिक उत्सव देखे। एक पारम्परिक वैद्य की झोपड़ी में जड़ी-बूटियों के साथ मैंने पक्षियों के पंजे और पैंगोलिन के शल्क (जो वर्षों पहले एकत्र किए गए थे) भी देखे। दूर-दराज के गांवों में मेरी मुलाकात धातु और बांस की हस्तकलाओं से जुड़े कलाकारों और शिल्पकारों से हुई, जिनका असाधारण जीवन और दुर्लभ कौशल ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के सरकारी वर्गीकरण के पीछे मानो ओझल हो गया है। एक स्थानीय हाट (आदिवासी बाजार) में मैंने तेंदू के पत्ते से बने दोने में लांदा पिया। यह चावल से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक पेय है, जो थोड़ा दानेदार होता है। महुआ के एक विशाल पेड़ के नीचे मेरी मुलाकात बैगा जनजाति के एक स्नेही परिवार से हुई, जो उबलते बर्तन में महुआ की शराब तैयार कर रहा था। उन्होंने मुझे पत्ते के दोने में उस गर्म और तीव्र पेय का स्वाद चखाए बिना जाने नहीं दिया, जबकि तब तक मुझे नाश्ता किए अधिक समय भी नहीं हुआ था। मेरी मुलाकात बैगा जनजाति की उन महिलाओं से भी हुई, जो आज भी अपने माथे, भुजाओं और पैरों पर पारंपरिक गोदना गुदवाती हैं। वे मिट्टी के घरों में रहती हैं और भालुओं, तेंदुओं, बाघों तथा जंगल के अन्य जीवों के साथ उस भूभाग को साझा करती हैं।
मैं उस शाम को कभी नहीं भूलूंगी, जब सांझ ढलते समय, प्रचंड वेग से गिरते तीरथगढ़ जलप्रपात की फुहारों के नीचे खड़े होकर मुझे अचानक स्वाधीनता की तीव्र अनुभूति हुई थी। मैं उस अनुभव को कुछ देर और जी लेना चाहती थी। लेकिन छत्तीसगढ़ की जनजातियों के बीच समय बिताते हुए मेरे भीतर एक गहरी उदासी का भाव भी बना रहा। इस उदासी का कारण यह था कि अब पुराने अनुष्ठान, वस्त्र और केश-सज्जा की पारंपरिक शैलियां, जंगलों और आदिवासी हाटों में सामाजिक मेलजोल- ये सब आधुनिकता की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। कभी मोटे अनाज और कोदो, सहजन तथा महुआ जैसे पोषक पारंपरिक खाद्य पदार्थों पर आधारित आदिवासियों का आहार अब चावल और दाल तक सिमट गया है, जिसके कारण कुपोषण बढ़ा है। जंगल तथा उसके संसाधनों के टिकाऊ और ‘जीरो-वेस्ट’ उपयोग से जुड़ा उनका समृद्ध पारंपरिक ज्ञान भी अब धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर है। वन संरक्षण की तथाकथित आधुनिक पद्धतियों की ओर झुकाव ने उन्हीं समुदायों को जंगल से दूर कर दिया है, जिन्होंने सदियों तक इस अमूल्य भूभाग की रक्षा की थी। अनेक आदिवासी समुदायों का भी अब जंगल से पारंपरिक संबंध टूट रहा है। आदिवासी परिवारों के साथ रहते हुए, तारों भरे आकाश के नीचे एक ओझा के साथ भोजन साझा करते हुए और सामाजिक रूप से प्रगतिशील परंपराओं की कहानियां सुनते हुए मेरे मन में एक ही विचार बार-बार उभरता रहा। आदिवासी बुजुर्गों की वर्तमान पीढ़ी ही हमारे लिए भारत के प्राचीन स्वदेशी ज्ञान को संरक्षित रखने का अंतिम अवसर है, जो प्रकृति के साथ टिकाऊ सह-अस्तित्व का मार्ग सिखाता है। उनके बच्चों- जिनकी रगों में आज भी जंगल बसा है- को केवल अकुशल श्रम का स्रोत बनाने के बजाय प्रकृतिविद्, पर्यटक-मार्गदर्शक और संरक्षणकर्मी के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता है। उन्हें पिछड़ा कहने के बजाय हमें उस सदियों पुराने ज्ञान को स्वीकार करना चाहिए, जो उन्होंने इस धरती के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीते हुए अर्जित किया है। भौतिक लालसा और पर्यावरण की क्षति से ग्रस्त इस दुनिया में छत्तीसगढ़ की यात्रा ने मुझे यह याद दिलाया कि ‘प्रगति’ की ओर बढ़ते हुए हम रास्ते में क्या-क्या खो देने का जोखिम उठा रहे हैं। भौतिक लालसा और पर्यावरण की क्षति से ग्रस्त इस दुनिया में छत्तीसगढ़ की यात्रा ने मुझे याद दिलाया कि ‘प्रगति’ की ओर बढ़ते हुए हम रास्ते में क्या-क्या खो देने का जोखिम उठा रहे हैं। हमें अपनी धरती के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीना सीखना होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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