अंतिम समय में कबीर कहां गए, यह रहस्य फूलों में ही बसा रहा। मीरा कहां अंतर्धान हुईं, कोई मूर्ति बता नहीं पा रही। भक्त भगवान में कैसे लीन होता है, उसके अनेक उदाहरण हमारे यहां हैं। भक्ति के लिए तीर्थ-मंदिर पहला कदम हो सकते हैं। उसके बाद आप स्वतंत्र हैं। आप जीवन भर किसी मंदिर न जाएं, किसी तीर्थ पर कदम न रखें तो भी भक्ति परवान चढ़ सकती है। अब जो हमारी नई पीढ़ी है, इनकी भक्ति करने का ढंग अलग होगा। पिछले 50 साल में अमेरिका में चर्च जाने वाले लोग 20% कम हो गए। वहां पुराने चर्चों में ताला लग गया। वहीं भारत में पुराने मंदिरों को नई व्यवस्था दी जा रही है। बड़े-बड़े कॉरिडोर बन रहे हैं। जमकर भीड़ आ रही है। उत्सव और त्योहार तो ऐसे मनाए जा रहे हैं, जिसमें ईश्वर की धूम और भक्तों का धड़ाका ही दिखता है। भक्ति ढूंढे नहीं मिलती। यह अच्छी बात है कि मंदिर संभाले जाएं। लेकिन वे पर्यटन, मनोरंजन या चुनावी एजेंडे का केंद्र ही न बन जाएं। कबीर और मीरा सिखा गए हैं- ईश्वर को प्रार्थना पसंद है प्रदर्शन नहीं।



