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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:ये पृथ्वी हमारा बड़ा घर है, अपने घर की तरह इसे भी साफ-सुथरा रखें

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हमारे दो घर होते हैं- एक छोटा और एक बड़ा। एक घर तो वह चारदीवारी है, जिसे हम अपना घर मानते हैं। उसमें हमारा सोफा होता है, डाइनिंग टेबल होती है, बिस्तर होता है। हम इस छोटे घर का विशेष ध्यान रखते हैं। उसे साफ रखते हैं और उसे सहेजते हैं, क्योंकि वह हमें सुरक्षा देता है। वह हमें धूल, गर्मी, ठंड, हवा और बारिश से बचाता है। इसी तरह हमारा एक बड़ा घर भी है, हमारी धरती का वातावरण। यह भी हमें सुरक्षा देता है। यदि यह बड़ा घर न हो, तो सूर्य की किरणें इतनी तीव्र हों कि हम उन्हें सहन न कर सकें। या धरती का तापमान इतना कम हो जाए कि यहां जीवन सम्भव न रहे।
परंतु इसके बावजूद- क्या कारण है कि हम अपने इस बड़े घर का ध्यान नहीं रखते? यदि पर्यावरण में बहुत अधिक गर्मी हो जाए, बहुत अधिक ठंड पड़ जाए, या बहुत ज्यादा बारिश हो जाए तो उसका असर हम पर पड़ता है। कुल मिलाकर पर्यावरण में जो कुछ भी होता है, उसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। लेकिन हम जो कुछ करते हैं, उसका प्रभाव भी पर्यावरण पर पड़ता है। वास्तव में, आधुनिक जीवन में मनुष्य का शायद ही कोई ऐसा कार्य है, जिसका पर्यावरण पर प्रभाव न पड़ता हो। और दुर्भाग्य से, हमारे अधिकांश कार्य पर्यावरण को सकारात्मक नहीं, नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
यह पर्यावरण, हमारा यह बड़ा घर, हमें जीवन देता है। यही हमें हवा देता है, पानी देता है, भोजन देता है और जीवन जीने योग्य परिस्थितियां प्रदान करता है। लेकिन बदले में हम इसे क्या देते हैं? हम इसे गंदा करते हैं। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषण डालते हैं। जब-जब हम खाना पकाते हैं, ट्रैवल करते हैं, बिजली का उपयोग करते हैं, कुछ खरीदते हैं, तब-तब हम कार्बन डाइऑक्साइड रूपी अदृश्य कचरा पर्यावरण में छोड़ते हैं, जो धरती के तापमान को बढ़ाने का काम करता है। हम सोचते हैं कि जलवायु परिवर्तन या प्रदूषण फैक्टरियों से होता है। नहीं, यह हमारे रोजमर्रा के जीवन में फैक्टरियों में बनाए सामान के अनियंत्रित उपभोग के कारण होता है।
हम सब रोज ही, या सच कहें तो हर मिनट ही अदृश्य कचरा फेंककर वातावरण रूपी हमारे बड़े घर को नुकसान पहुंचा रहे हैं। एक बार मैंने अपने एक व्याख्यान में श्रोताओं से कहा, मैं आप सभी को थोड़ा-थोड़ा कचरा देता हूं। क्या आप इसे अपने घर ले जाकर अपने ही घर में फेंक देंगे? सबने तुरंत मना कर दिया। किसी ने कहा, पत्नी डांटेगी। किसी ने कहा, मां नाराज हो जाएगी। तब मैंने उनसे पूछा, जब हम अपने छोटे-से घर में भी कचरा नहीं फेंक सकते, तो अपने उस बड़े घर में कचरा कैसे फेंक देते हैं, जो हमें जीवन देता है? आज देश-दुनिया में बेमौसम बारिश हो रही है, ठंडे यूरोप में जानलेवा हीटवेव चल रही है, जंगलों में आग लग रही है। मौसम का जो यह असंतुलन हम देख रहे हैं, वह प्रकृति की प्रतिक्रिया है। यह प्रकृति का हमें यह बताने का तरीका है कि कुछ तो गड़बड़ हो रहा है।
कभी-कभी मैं सोचता हूं कि यदि आप प्रकृति होते, तो शायद आप भी सभी को ऐसी ही सजा देते। आखिर हम उसके घर में कचरा जो फैला रहे हैं, उसके संतुलन को बिगाड़ रहे हैं और फिर भी उम्मीद कर रहे हैं कि सब कुछ सामान्य बना रहे। जो कचरा हम धरती पर फेंक रहे हैं, उसकी सजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतनी पड़ेगी। यह कटु सत्य हमें होश में लाने के लिए है। हो सकता है इसी से हमारा पर्यावरण सुधार का सही काम चालू हो जाए। और हम सीमित धरती- जिसके संसाधन भी सीमित हैं- पर अपनी जरूरतों को भी सीमित करने की शुरुआत कर दें। जलवायु सुधार टेक्नोलॉजी या नियम-कानून से शुरू नहीं होता। यह जागरूकता से शुरू होता है। संयम से शुरू होता है। यह हममें से हर एक द्वारा अपने बड़े घर के साथ उसी सम्मान से पेश आने से शुरू होता है, जैसा हम अपने बेडरूम के साथ करते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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