देशभर में हल्ला है। राम मंदिर का। और मंदिर की दानपेटी से चोरी का। कोई कह रहा है- बड़े-बड़ों को छोड़ दिया है। छोटों पर कार्रवाई की जा रही है। सरकार का कहना है जो भी दोषी होगा, सजा से बच नहीं पाएगा। राम-धन की चोरी कब से चल रही थी और कितनी हो चुकी, कोई नहीं जानता। किसी के घर से सोना-चांदी बरामद हो रहा है! किसी के घर से मंदिर की संदूक ही जब्त हो रही है। जांच में आखिर क्या निकलेगा, पता नहीं! हालांकि इस मामले में कौन, किसको बचा रहा है, कौन किसे फंसा रहा है, इसका प्रामाणिक निष्कर्ष तो सामने नहीं आ सका है लेकिन राज्य सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि एसआईटी पर किसी तरह का राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव न आने पाए। हो सके तो जांच अदालत की निगरानी में कराई जाए। दान राशि का निष्पक्ष और स्वतंत्र ऑडिट नहीं होगा, तब तक चोरी की रकम का अनुमान लगाना दुष्कर होगा। इस घटना ने अयोध्या के महत्व को भी प्रभावित किया है। अयोध्या का पहला वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। इसमें अयोध्या को देवताओं की नगरी बताया गया है : “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोध्या’। देवताओं की नगरी कदाचित् इसलिए कि ब्रह्मा के मानसपुत्र मनु ने इसकी स्थापना की थी। माना जाता है इसका निर्माण भगवान विष्णु की सलाह पर स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा की देखरेख में हुआ था। स्कंदपुराण के अनुसार, अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है। यह भी कहा जाता है कि अयोध्या को पहली बार विवस्वत (यानी सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था। अयोध्या के लिए इस तरह की घटनाएं नई नहीं है। देवताओं की इस नगरी ने बल, प्रताप और बलिदान देखे तो दु:खों के पहाड़ भी झेले। ऋषितुल्य राजा मांधाता का साम्राज्य देखा तो राजा हरिश्चंद्र की सत्यवादिता और वचन की खातिर राजपाट त्याग देने, यहां तक कि मर-मिटने तक का बलिदान भी देखा। भागते रथ के टूटे पहिए में अपनी अंगुली लगा देने वाला कैकेयी का त्याग देखा तो राम को वनवास भेजने वाले उन्हीं कैकेयी के हठ की भी साक्षी रही। अयोध्या की तुलना स्वर्ग से की गई तो इसकी पीड़ा का भी पारावार नहीं रहा। पुत्र वियोग में दशरथ का प्राण त्यागना हो या भरत का राजपाट छोड़कर पादुका पूजन हो, सबकुछ आज भी अयोध्या की आंखों में झिलमिलाता रहता है। लक्ष्मण की चौदह साल की सेवा हो या उर्मिला का विरह, ये सब सिहरन पैदा करने वाले पल रहे। त्रेता से कलयुग तक की अनगिन कहानियां इस नगरी की छाती में धंसी हुई हैं। इन्हें एक-एक करके निकालना अपने ही दु:खों की सुइयां पोरों से निकालने की तरह है। जिस राम मंदिर में आज लोग रामलला के दर्शन कर पा रहे हैं, उस जन्मभूमि के लिए कोई साढ़े चार सौ वर्षों तक संघर्ष चला। कभी संतों और धर्मगुरुओं ने इस आंदोलन की कमान संभाली तो कभी राजनीतिक दल और उनके नेता भी इसमें शरीक हुए। केवल इस आंदोलन के कारण कई सरकारें ताश के पत्तों की तरह गिरी भी और एक अजीब आंधी की तरह आई और बनी भी। आंदोलन को पहली बार उग्रता तब मिली, जब बाबरी के ताले खोल दिए गए। दरअसल, शाहबानो प्रकरण पर उग्र हुई मुस्लिम लॉबी के दबाव में जब केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया तो मंदिर आंदोलन की उग्रता चरम की तरफ बढ़ने लगी। सरकार ने शाहबानो प्रकरण से मायूस हिंदुओं को खुश करने के लिए बाबरी के बंद पड़े ताले 1 फरवरी 1986 को खोल दिए। किसे पता था बाबरी के बंद तालों के भीतर आंदोलन की आग दबी पड़ी थी। अशोक सिंघल के शिलापूजन अभियान ने आंदोलन को घर-घर तक पहुंचा दिया। आज अशोक सिंघल जीवित होते तो उन्हें कैसा लगता, जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही राम मंदिर के लिए संघर्ष करते गुजार दिया और आखिर में यह कहते हुए प्राण त्याग दिए कि राम मंदिर बनते हुए देखना ही मेरी अंतिम इच्छा है! अयोध्या के इस राम मंदिर के लिए सैकड़ों, हजारों लोगों ने वर्षों तक संघर्ष किया है और अपने प्राणों की आहूति तक दे दी है। उनकी आत्मा को इस तरह की चोरी की घटनाओं से कितना आघात पहुंचा होगा, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।

