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एन. रघुरामन का कॉलम:कॅरिअर काउंसलिंग से परे क्यूरियोसिटी काउंसलिंग की ओर कदम बढ़ाने चाहिए

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आठवीं कक्षा से ही हर अकादमिक सत्र में क्लास टीचर एक ही सवाल पूछती थीं कि ‘बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?’ लड़का एक ही जवाब देता, ‘अभी नहीं जानता।’ जबकि सहपाठियों की महत्वाकांक्षा पहले से तय थीं- डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट या बैंकर। यह लड़का हमेशा ‘अन-डिसाइडेड’ ही रहता था। टीचर को लगता था कि वह स्लो-लर्नर है, इसलिए जवाब देने का दबाव नहीं डालती थीं। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उसका सपना तो दूसरों से ज्यादा अनोखा था। उसके पिता कॉबलर थे और 13 सालों से वह उन्हें फुटवियर बनाते देख रहा था। हर सिलाई, हर सोल और हर ग्राहक उसकी पाठशाला बन गया था। चुपके से उसके भीतर एक सपना पनप चुका था। कॉबलर बनने का नहीं, बल्कि यह कि एक दिन वह खुद की शू कंपनी में पिता को चेयरमैन बनाएगा। लेकिन जगहंसाई के डर से उसने सपना किसी से साझा नहीं किया। एक दोपहर टीचर ने उसे जूते बनाने की प्रक्रिया में डूबे देखा। अगले हफ्ते उन्होंने एक शू कंपनी के मालिक को क्लास में बुलाया। जैसे-जैसे सेशन आगे बढ़ा, शांत रहने वाला लड़का बिल्कुल बदल गया। उसने लेदर ग्रेड, मोल्ड्स, प्रोडक्शन लाइन, क्वालिटी कंट्रोल, एक्सपोर्ट, मशीनरी, सप्लाई चेन और ब्रांडिंग को लेकर सवाल पूछे। आंत्रप्रेन्योर हैरान रह गया। ज्यादातर स्टूडेंट्स ने भी ये शब्द पहली बार सुने, लेकिन लड़का इंडस्ट्री की भाषा बोल रहा था। आंत्रप्रेन्योर ने तुरंत उसकी जिज्ञासा पहचान ली, जो किताबें कभी नहीं दे सकतीं। सेशन के अंत में उसने लड़के को छुट्टियों के दौरान स्टाइपेंड के साथ इंटर्नशिप का ऑफर दिया और मेंटर बनने का वादा भी किया। इसी अवसर ने उसके सपने को दिशा दे दी। यह महज एक इंस्पायरिंग स्टोरी नहीं है। यह कैलिफोर्निया की ‘लिंक्ड लर्निंग अलायंस’ की फिलॉसफी को दर्शाती है। यह एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है, जो स्कूलों के साथ साझेदारी में 3.30 लाख से अधिक स्टूडेंट्स के लिए 600 से ज्यादा कॅरिअर पाथवे तैयार कर रही है। चंद पारंपरिक पेशों में फिट होने के बजाय स्टूडेंट्स यहां कृषि, मनोरंजन और पब्लिक पॉलिसी जैसे विविध क्षेत्रों को एक्सप्लोर करते हैं। लिंक्ड लर्निंग सिर्फ विशेषज्ञों की स्पीच ही आयोजित नहीं करती, बल्कि स्टूडेंट्स को ड्यूल एनरोलमेंट के जरिए कॉलेज क्रेडिट दिलाने और उद्योगों द्वारा मान्यता प्राप्त सर्टिफिकेशन हासिल करने में भी मदद करती है। यहां शिक्षा क्लासरूम तक सीमित होने के बजाय वास्तविक जीवन से जुड़ जाती है। इस पहल में आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के स्टूडेंट्स पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि परिस्थितियों की मजबूरी के चलते प्रतिभा का दम न घुट जाए। इनमें से कई पार्टिसिपेंट शायद कभी पारंपरिक कॉलेज शिक्षा न लें, फिर भी वे अपनी स्किल, आत्मविश्वास और कॅरिअर अवसरों के साथ ग्रेजुएट होते हैं। इस पहल की एक और खासियत है- लगातार मिलने वाला फीडबैक। हर प्रोजेक्ट के बाद छात्र अपना काम उद्योग विशेषज्ञों के सामने रखते हैं, जो केवल ज्ञान को ही नहीं, बल्कि जिज्ञासा, कम्युनिकेशन, धैर्य और प्रॉब्लम-सॉल्विंग जैसी खूबियों को भी परखते हैं। टीचर उस फीडबैक को क्लासरूम लर्निंग में शामिल करते हैं, जिससे हर बच्चा अपनी ताकत के साथ पढ़ाई में आगे बढ़ता रहता है। कई बार परिणाम स्टूडेंट की मूल रुचि से सीधे जुड़े हुए भी नहीं होते। इतिहास में रुचि रखने वाला कोई छात्र आगे चलकर पीडियाट्रिशियन बन सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति की कहानी को धैर्य से समझने, सोच-समझकर सवाल पूछने और असम्बद्ध दिखने वाले तथ्यों को जोड़ने की आदत ही वह खूबी है, जो उसे असाधारण डॉक्टर बनाती है। रुचि ऐसी क्षमताएं विकसित करती है, जो अकसर विषय से भी ज्यादा मायने रखती है। शायद स्कूल अब तक बच्चों से गलत सवाल पूछते रहे हैं। ‘बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?’ इसके बजाय उन्हें पूछना चाहिए कि ‘ऐसा क्या है जिसमें तुम्हें समय का पता ही नहीं चलता? कौन-सी समस्या तुम्हें उत्साहित करती है? किस चीज को लेकर तुम्हारे भीतर स्वाभाविक जिज्ञासा है? कॅरिअर जीवन में कई बार बदल सकते हैं, लेकिन जिज्ञासा बहुत कम बदलती है। शिक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी डॉक्टर, इंजीनियर या आंत्रप्रेन्योर तैयार करना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी है पर्याप्त समय रहते बच्चे में छिपी प्रतिभा को पहचान लेना, ताकि वह खुद पर भरोसा करना शुरू कर दें- इससे पहले कि दुनिया उनसे कहे कि वे क्या नहीं बन सकते। फंडा यह है कि भविष्य उन्हीं लोगों का है, जिन्हें पता है कि सच में उन्हें क्या करना पसंद है और जिन्हें उस काम को आगे बढ़ाने का मौका दिया जाता है।

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