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आदर्श जोशी का कॉलम:सड़कों के साथ ही “ड्राइवरों’ का अच्छा होना भी उतना ही जरूरी है

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आप अपनी लेन में चल रहे हैं, सुरक्षित दूरी बनाए हैं और गाड़ी भी निर्धारित स्पीड में ही चला रहे हैं। तभी अचानक कोई दूसरा वाहन बिना चेतावनी के सामने से कट मार देता है। कोई मोटरसाइकिल वाला गलत दिशा से आ जाता है। कोई कार एग्जिट चूक जाने के बाद हाईवे पर ही रिवर्स होने लगती है। कोई ट्रक फास्ट-लेन घेरे रहता है। इंडिकेटर दिखावे की चीज बने रहते हैं। हाई बीम सामने से आने वालों को लगभग अंधा बना देती है। मोबाइल ड्राइवर का ध्यान स्टीयरिंग से भटकाता रहता है। ये दृश्य इतने आम हो चले हैं कि अब हमें हैरानी भी नहीं होती। कई मायनों में ये भारत में रोजमर्रा की ड्राइविंग का हिस्सा बन चुके हैं। जब भी कोई गंभीर एक्सीडेंट होता है तो सार्वजनिक बहस आमतौर पर सड़कों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। क्या सड़क पर गड्ढा था? हाईवे का डिजाइन खराब था? सेफ्टी बैरियर नहीं थे? ये सवाल महत्वपूर्ण भी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फलोदी दुर्घटना मामले में ऐसी कई चिंताओं को हाईलाइट किया और हाईवे की सुरक्षा सुधारने के निर्देश जारी किए। अदालत ने हाईवे प्रबंधन और अतिक्रमण से लेकर इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम तथा दुर्घटना रोकथाम उपायों तक कई मुद्दों पर विचार किया। यह दखल जरूरी था, क्योंकि बेहतर सड़कें, सुरक्षित हाईवे और तेज इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम जान बचा सकते हैं। लेकिन यह फैसला ऐसे सवाल पर भी ध्यान दिलाता है, जो शायद ही कभी पूछा जाता है- क्या हम ड्राइवरों पर भी ध्यान दे रहे हैं? सड़क सुरक्षा की शुरुआत हाईवे से नहीं होती, बल्कि तब होती है जब कोई वाहन चलाने का अधिकार प्राप्त कर लेता है। ड्राइविंग लाइसेंस सरकार द्वारा दी जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण अनुमतियों में से एक है। यह किसी व्यक्ति को पल भर में भारी नुकसान पहुंचा सकने वाली मशीन चलाने का अधिकार दे देता है। लेकिन व्यवहार में ड्राइविंग लाइसेंस लेने की प्रक्रिया को अकसर कौशल, निर्णय-क्षमता और जिम्मेदारी के गंभीर आकलन के बजाय एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मान लिया जाता है। इसके नतीजे रोज दिखते हैं। लेन अनुशासन की अनदेखी होती है। गलत साइड से ओवरटेक आम बात है। चालक असुरक्षित स्थानों पर वाहन रोक देते हैं, बेमतलब हाई बीम का इस्तेमाल करते हैं और ट्रैफिक सिग्नल को मानते नहीं। ऐसे व्यवहार को अकसर महज अनुशासनहीनता माना जाता है। लेकिन समस्या इससे गहरी है : बहुत-से ड्राइवरों को कभी ठीक से सिखाया ही नहीं गया कि ये नियम आखिर क्यों बनाए गए हैं। वाहन को स्टार्ट करना, गियर बदलना, रिवर्स और पार्क करना मैकेनिकल स्किल हैं, जबकि ड्राइविंग के लिए जागरूकता, निर्णय-क्षमता और अनुशासन जरूरी होता है। मतलब, खतरों का अनुमान लगाना, सुरक्षित दूरी बनाए रखना, लेन अनुशासन का पालन, ब्लाइंड स्पॉट्स को समझना और यह मानना कि सड़क पर लिया हर निर्णय दूसरों की सुरक्षा को प्रभावित करता है। कोई व्यक्ति वाहन चलाना जानता हो, तब भी वह अनसेफ ड्राइवर हो सकता है। पर लाइसेंसिंग प्रक्रिया मानती है कि वाहन चला सकना ही सुरक्षित ड्राइविंग की क्षमता भी है। भारत में 2024 में 4.68 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1.75 लाख से अधिक लोग मारे गए। 61% से अधिक दुर्घटनाएं अकेले ओवर-स्पीडिंग से हुईं। 26% का कारण खतरनाक या लापरवाही भरी ड्राइविंग और ओवरटेकिंग रहा। ज्यादातर दुर्घटनाओं के लिए ये दोनों ही जिम्मेदार हैं। वर्षों तक हमने इस बात पर चर्चा की है कि सड़कें कैसी बनाई जानी चाहिए। लेकिन अब हमें सुनिश्चित करना होगा कि ड्राइविंग लाइसेंस वास्तव में योग्यता का प्रमाण बने। ड्राइविंग-एजुकेशन को मजबूत करने की भी जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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