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संजय कुमार का कॉलम:राजनीति में उपचुनावों का ट्रेंड किस ओर इशारा करता है?

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भारत में उपचुनाव तभी कराए जाते हैं, जब किसी विधानसभा या लोकसभा सीट के रिक्त हो जाने के बाद अगला चुनाव होने में छह माह से अधिक का समय शेष हो। लेकिन लोगों का ध्यान कुछ उपचुनाव ही खींच पाते हैं। वर्तमान में तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मंजलपुर विधानसभा सीट शामिल हैं। मंजलपुर को लेकर शायद ही कोई चर्चा हो रही हो, लेकिन दतिया और बांकीपुर उपचुनाव अलग-अलग कारणों से सुर्खियों में हैं। सियासी तौर पर दोनों सीटों के उपचुनाव ने लोगों में रुचि पैदा की है। लेकिन यह रुचि थोड़े समय की ही साबित हो सकती है, क्योंकि दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी बड़ी संख्या में वोटरों की पसंद बनी हुई दिखाई देती है। आंकड़े भी बताते हैं कि उपचुनावों में अधिकतर वोटरों की पहली पसंद राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी ही होती है। बीते पांच वर्षों में विभिन्न राज्यों में 153 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें से 119 सीटों पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन ने जीत हासिल की, जो 78% सफलता दर को दर्शाता है। वहीं विपक्षी दलों या गठबंधनों के उम्मीदवार 34 सीटें ही जीत पाए। उनकी सफलता दर 22% रही। उपचुनावों के संदर्भ में यही पैटर्न बीते पांच सालों से दिखाई दे रहा है। मौजूदा उपचुनावों से पहले 2026 में 7 अन्य उपचुनाव हुए थे और सभी सीटों पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन जीता था। 2025 में 15 सीटों पर उपचुनाव हुए, जिनमें से 9 सीटें राज्य की सत्ता पर काबिज दल या गठबंधन ने जीतीं, जबकि 6 विपक्ष के खाते में गईं। 2024 की तस्वीर भी इससे अलग नहीं थी। उस वर्ष 86 सीटों पर हुए उपचुनाव में 69 सीटें सत्तारूढ़ दल/गठबंधन ने जीती, जबकि 17 पर विपक्षी दलों/गठबंधनों ने जीत दर्ज की। 2023 में 17 उपचुनावों में 12 सीटों पर सत्ताधारी दल/गठबंधन जीता और 5 सीटें विपक्षी उम्मीदवारों के खाते में गईं। इसी तरह 2022 में 28 सीटों के उपचुनाव में 22 पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन विजयी रहा और विपक्ष के उम्मीदवार केवल 6 सीटें ही जीत पाए। दतिया और बांकीपुर के उपचुनावों ने सियासी दिलचस्पी पैदा की है। खासकर तब, जब भाजपा ने बांकीपुर विधानसभा सीट पर अपना उम्मीदवार बदल दिया और मध्यप्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र को दतिया से टिकट नहीं दिया गया तो भाजपा कार्यकर्ता इसके विरोध में उतर आए। मिश्र राज्य के कद्दावर नेता रहे हैं। लेकिन पार्टी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाने का निर्णय किया। बांकीपुर सीट पर भी भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित किया था, लेकिन उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया। बांकीपुर सीट इसलिए भी सुर्खियों में है, क्योंकि जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर यहां से चुनावी डेब्यू कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि उनकी पार्टी वर्ष 2025 में पहली बार बिहार चुनाव में मैदान में उतरी थी, लेकिन प्रशांत खुद किसी सीट से चुनाव नहीं लड़े थे। चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। उसे केवल 3.5% मत मिले और वह खाता तक नहीं खोल पाई थी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि दतिया और बांकीपुर सीटें इसलिए चर्चा में नहीं हैं कि विपक्ष ने इनमें कद्दावर नेताओं को उम्मीदवार बनाया है अथवा यहां कोई बेहद दिलचस्प चुनावी मुकाबला होने जा रहा है। इन दोनों उपचुनावों पर चर्चा किन्हीं अन्य कारणों से हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के भीतर कुछ उथल-पुथल है, जो कि एक असामान्य स्थिति मानी जाती है। इसके चलते भी ये दोनों उपचुनाव दिलचस्प बन गए हैं। बीते 5 वर्षों के 153 उपचुनाव एक ट्रेंड की ओर संकेत करते हैं। यह कि एक औसत भारतीय वोटर उम्मीदवार के बजाय पार्टी के लिए वोट देना पसंद करता है। छोटे राज्य इसमें अपवाद हो सकते हैं, जहां प्रत्याशी की लोकप्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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