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शेखर गुप्ता का कॉलम:कांग्रेस ने राष्ट्रवाद के मुद्दे से दूरी क्यों बनाई?

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राष्ट्रीय राजनीति में फिलहाल जो मंथन चल रहे हैं, उसके दो पहलू हैं। एक यह कि लोकसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भाजपा ने भारत को लगभग एक पार्टी के शासन वाला देश बनाने का चमत्कार कर डाला है। और दूसरा यह कि यह काम क्षेत्रीय दलों को तोड़कर किया जा रहा है और अब कांग्रेस ही एकमात्र महत्वपूर्ण साबुत विपक्षी पार्टी बची है। इस तरह भारतीय राजनीति दो-दलीय समीकरण में तब्दील हो गई है। यह बिलकुल सरल और सीधा समीकरण होना चाहिए था, बशर्ते कांग्रेस दमदार चुनौती के रूप में सामने होती। लेकिन भाजपा के खिलाफ केवल 10 फीसदी मुकाबले में जीत हासिल करने की दर के बूते वह ऐसा नहीं कर सकती। वैसे, दो दलीय व्यवस्था तो भाजपा को बिलकुल मुफीद होगी, क्योंकि उसे केवल ताकतवर क्षेत्रीय दलों से मुकाबले में मशक्कत करनी पड़ती है और ऐसे अधिकतर दल कमजोर किए जा चुके हैं। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का इम्तिहान आगामी मुकाबले में योगी से हो जाएगा। अब 3 सवाल उभरते हैं। पहला : भाजपा को कांग्रेस इतनी सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी क्यों लगती है? दूसरा : कांग्रेस में क्या कमी है कि वह विश्वसनीय चुनौती नहीं बन सकती? तीसरा : कांग्रेस खुद को कैसे उबारे? पहले सवाल का जवाब बहुत आसान है : भाजपा चार इंजिन के बूते उड़ान भर रही है- हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, जनकल्याण के कार्यक्रमों का कुशल क्रियान्वयन और सबकी नजरों में आने वाले भारी-भरकम इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास। कांग्रेस के पास इन सबका कोई विश्वसनीय जवाब नहीं है, यह दूसरे सवाल का जवाब दे देता है। कांग्रेस के मुताबिक, भाजपा जो कर रही है वह गलत है, तो सवाल उठता है वह खुद सत्ता में आने के बाद क्या करेगी? अर्थव्यवस्था, रणनीतिक मसलों और डिफेंस के मोर्चों पर कांग्रेस भाजपा से अलग क्या करेगी? पाकिस्तान, चीन, अमेरिका और पश्चिम एशिया से वह कैसे निबटेगी? प्रतिरक्षा पर वह किस तरह खर्च करेगी? भाजपा के विकल्प के तौर पर भविष्य का उसका क्या खाका है? भाजपा अगर उसके मुताबिक पूंजीवादी है और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता कर रही है, तो वो ऐसा क्या करेगी, जो अलग होगा? अगर कांग्रेस खुद को एक विकल्प मानती है, जिसे मतदाता भाजपा के बदले चुनेंगे, तो वह अलग क्या पेश कर रही है? कांग्रेस को पहले इन सारे सवालों का जवाब देना होगा। इसके अलावा, हमने भाजपा की उड़ान को ऊंचाई देने वाले जिन चार इंजिनों का जिक्र किया था उनका जवाब ढूंढना होगा। सबसे पहले तो हिंदुत्व को ही लें। कांग्रेस को इस मोर्चे पर भाजपा का मुकाबला करने की कोशिश तक नहीं करनी चाहिए। यह जमीन जीती जा चुकी है और कांग्रेस उसमें कोई टूट-फूट नहीं कर सकती, चाहे उसके नेता कितने ही मंदिरों के दर्शन कर लें। शिवसेना तक ने यह कोशिश छोड़ दी है। वास्तव में, उद्धव ठाकरे ने कुछ दार्शनिक अंदाज से मुझसे एक बार कहा भी था कि उनके पिता ने महाराष्ट्रवाद के मुद्दे को छोड़ हिंदुत्व को अपनाकर गलती की, क्योंकि इसने भाजपा को शिवसेना की जमीन पर कदम रखने और उस पर कब्जा करने का मौका दे दिया। जनकल्याण के मुद्दे पर कांग्रेस पूरी दुनिया मुट्ठी में देने का वादा कर सकती है। ऐसा उसने कर्नाटक और तेलंगाना में करके सफलता हासिल की। इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में उसे समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इतने सालों से वह कई बड़ी परियोजनाओं का विरोध करती दिखी है, निकोबार की परियोजना ताजा मिसाल है। तो धर्म का मुद्दा उसकी पहुंच से परे है, जनकल्याण/विकास का मुद्दा इतना निर्विवाद है कि उसमें भावनात्मकता नहीं जोड़ी जा सकती। सो, कांग्रेस के लिए ले-देकर राष्ट्रवाद का मुद्दा ही बचता है। कांग्रेस ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को किस तरह खारिज किया है, यह 2014 के बाद की उसकी सियासत का सबसे रहस्यमय पहलू है। उसके कुछ नेता आज भले ही यूरोप के पर्यावरणवादी नेताओं जैसे दिखने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन असली कांग्रेस खून के आंसू रोने वाले शांतिवादियों की पार्टी कभी नहीं रही है। यह वह पार्टी रही है, जिसने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए और लाल बहादुर शास्त्री के राज में 1965 की जंग इस लिहाज से जीती कि उसने कश्मीर को हड़पने के इरादे से हमला करने वाले पाकिस्तान को पीछे खदेड़ दिया था। कांग्रेस ने उत्तर-पूर्व के बागियों से भी क्रूरता के साथ मुकाबला किया, 5 मार्च 1966 को आइजोल की घेराबंदी किए बागियों को सरकारी खजाने पर कब्जा करने, असम राइफल्स की बटालियन के मुख्यालय और डिप्टी कमिश्नर के निवास पर कब्जा करने से रोकने के लिए वायुसेना के विमानों को रवाना किया। ऑपरेशन ब्लूस्टार के तहत उसने सेना को स्वर्ण मंदिर में भेज दिया था। इसके बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर भी किया था। पहले दो ऑपरेशन इंदिरा गांधी के दौर में और अंतिम दो ऑपरेशन उनके पुत्र राजीव गांधी के दौर में किए गए। इसके बाद कांग्रेस ने कश्मीर घाटी और पंजाब (1991-95) में आतंकवाद और अलगाववाद के सबसे खूनी दौर का मुकाबला किया। यह पीवी नरसिंह राव के समय में किया गया। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू के दौर में भी नगा बागियों के साथ सबसे कठोर तरीकों से लड़ाई लड़ी गई। नेहरू ने गोवा को मुक्त कराने के लिए सेना भेजी थी। कांग्रेस अपने उन प्रधानमंत्रियों को भले न पसंद करे, जो नेहरू परिवार से नहीं थे, लेकिन हकीकत यही है कि उसका कोई नेता ऐसा नहीं हुआ, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में कमजोर रहा हो। इसलिए भी आश्चर्य होता है कि राष्ट्रवाद वाली मूल पार्टी रास्ता कैसे भूल गई। चाहे उरी कांड के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हो या पुलवामा कांड के बाद बालाकोट पर हवाई हमला या पूर्वी लद्दाख/गलवान में संकट या ऑपरेशन सिंदूर- कांग्रेस ने सब पर सवाल खड़े करके और सबूतों की मांग करके अपना ही नुकसान किया। ऑपरेशन सिंदूर के मामले पर संसद में राहुल गांधी के बयान में ज्यादा जोर इस बात पर था कि भारत ने कितने विमान गंवाए और क्यों। उनकी पार्टी के पंजाब के एक सांसद ने तो भारतीय वायुसेना के मार गिराए गए विमान का एक टुकड़ा तक प्रदर्शित किया। इस सबको कितना ‘स्मार्ट’ कदम कहा जाएगा? कांग्रेस चाहे तो राष्ट्रवाद पर एक बहस छेड़ सकती है
भारतीय राष्ट्रवाद हमारे इतिहास, आजादी के आंदोलन और संविधान के बारे में साझा भावनाओं से उभरा है। भाजपा ने इसका हिंदूकरण कर दिया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस बहस उठा सकती है। लेकिन अगर उसने अपना वर्तमान रवैया जारी रखा, तो कोई भी उसका विश्वास नहीं करेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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