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मेघना पंत का कॉलम:अरेंज्ड मैरिज की व्यवस्था को एक ‘अपग्रेड’ की जरूरत है

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पीढ़ियों से भारतीय माता-पिता अपनी बेटियों से कहते आए हैं कि मन लगाकर पढ़ो, बड़े सपने देखो, जीवन में कुछ बनो। लेकिन विवाह की उम्र आते-आते यह संदेश बदल जाता है। इसके बाद वे अचानक उनसे यह अपेक्षा करने लगते हैं कि समझौता करना सीखो!
मैंने तो इस पटकथा को कई बार घटित होते देखा है। डॉक्टर, आंत्रप्रेन्योर, कलाकार, एकेडमिक बनने का सपना देखने वाली जाने कितनी ही प्रतिभाशाली लड़कियां कॉलेज के बाद- और कई बार तो पढ़ाई पूरी होने से पहले ही अचानक ओझल हो जातीं। उनका विवाह हो जाता। करियर उनके लिए एक जरूरी विकल्प नहीं रह पाता। आर्थिक आत्मनिर्भरता गैर-जरूरी समझी जाने लगती। उनकी तमाम महत्वाकांक्षाओं को समेटकर एक डिजाइनर लहंगे में रख दिया जाता! उनकी पहचान तीन शब्दों तक सिमटकर रह जाती- पत्नी, मां और बहू। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह अरेंज्ड मैरिज के खिलाफ कोई दलील नहीं है। ऐसे लाखों विवाह आज सुखी, स्नेहपूर्ण और सफल हैं। लेकिन यहां हम अरेंज्ड मैरिज के उस स्वरूप के खिलाफ बात कर रहे हैं, जो आज्ञाकारिता को सद्गुण, अनुपालन को सहमति और कर्तव्य को इच्छा समझने की भूल करता है। बीते कुछ दशकों में भारत में व्यापक बदलाव आया है। महिलाएं विश्वविद्यालयों की मेरिट सूची में शीर्ष स्थान हासिल कर रही हैं, कंपनियों का नेतृत्व कर रही हैं, लड़ाकू विमान दस्तों की कमान संभाल रही हैं, यूनिकॉर्न कंपनियां खड़ी कर रही हैं और उच्चतम न्यायालय में प्रभावी पैरवी कर रही हैं। हम उन पर महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर भरोसा करते हैं, लेकिन जीवनसाथी चुनने का निर्णय लेने का भरोसा अब भी नहीं करते। सवाल आज भी वही हैं : लोग क्या कहेंगे? क्या लड़का सही समुदाय से है? क्या लड़की एडजस्ट कर पाएगी? हम कितनी बार किसी लड़की से यह पूछते हैं कि उसकी खुद की इच्छा क्या है? हाल ही के सिया गोयल के मामले को ही लें। सिया के अपराध का किसी भी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता, लेकिन इस घटना ने हममें से कई लोगों को कुछ असहज करने वाले सवालों का सामना करने के लिए मजबूर किया है। वो यह है कि जब महिलाओं को महसूस होता है कि उनके जीवन के सबसे बड़े निर्णयों में से एक पर उनका अधिकार नहीं है, तब क्या होता है? ऐसा जीवन जीने के भावनात्मक परिणाम क्या होते हैं, जिसकी रूपरेखा मुख्य रूप से परिवार की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार की गई हो? हम इन सवालों को किसी त्रासदी के घटित होने के बाद पूछने का जोखिम नहीं उठा सकते। हमें इन्हें विवाह तय होने से पहले ही पूछना होगा। क्योंकि अब हम ऐसी पीढ़ी की महिलाओं को देख रहे हैं, जिनके लिए सहमति का अर्थ केवल विवाह के दिन ‘हां’ कहना नहीं है। उनके लिए सहमति का अर्थ है भावनात्मक दबाव, सामाजिक बहिष्कार या आजीवन अपराध-बोध के बिना ‘ना’ कहने की स्वतंत्रता होना। यह तय करने की स्वतंत्रता होना कि विवाह करना है या नहीं, कब करना है और किससे करना है। और हां, ये कोई पश्चिमी विचार नहीं हैं, ये मानवीय विचार हैं! विडम्बना यह है कि हम अपनी बेटियों की शिक्षा पर वर्षों तक निवेश करते हैं, उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने, बड़े स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन जैसे ही विवाह की बात आती है, स्वतंत्र सोच अचानक विद्रोह मानी जाने लगती है। समस्या स्वयं अरेंज्ड मैरिज में नहीं है। समस्या इस तथ्य में है कि हमने विवाह संस्था को छोड़कर लगभग हर चीज का आधुनिकीकरण कर लिया है। लेकिन विवाह आज्ञाकारिता का पुरस्कार नहीं होना चाहिए। वह एक स्वतंत्र निर्णय का परिणाम होना चाहिए। परिवार अब भी होने वाले जीवनसाथियों का आपस में परिचय करा सकते हैं। समाज अब भी अपनी परम्पराओं का उत्सव मना सकता है। संस्कृति अब भी कायम रह सकती है। लेकिन जब कोई परम्परा व्यक्ति की स्वतंत्रता को समृद्ध करने के बजाय उसका दमन करने लगे, तो उसमें बदलाव जरूरी हो जाता है। सबसे मजबूत रिश्ते वो नहीं होते, जो पारिवारिक दबाव या सामाजिक जिम्मेदारी पर टिके हों। वे वो होते हैं, जो दो लोगों के एक-दूसरे को स्वतंत्र रूप से चुनने पर आधारित होते हैं। समस्या स्वयं अरेंज्ड मैरिज में नहीं है। समस्या इस तथ्य में है कि हमने विवाह संस्था को छोड़कर लगभग हर चीज का आधुनिकीकरण कर लिया है। लेकिन विवाह को आज्ञाकारिता का पुरस्कार मात्र नहीं होना चाहिए। वह एक व्यक्ति के स्वतंत्र निर्णय का परिणाम होना चाहिए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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