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भास्कर ​रिसर्च: खरीदारी का तरीका बदल रहा:सोफा-टीवी से आरओ तक मासिक किराए पर लेने का दौर, घरेलू चीजों का रेंटल मार्केट 33500 करोड़ पहुंचा

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आजकल सामान खरीदने के बजाय उसे किराये (सब्सक्रिप्शन) पर लेने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती महंगाई और बार-बार शहर बदलने की मजबूरी ने लोगों की सोच बदल दी है। अब लोग सोफा, बेड, टीवी, फ्रिज, एसी और कार जैसी महंगी चीजों का मालिक बनने के बजाय, हर महीने एक निश्चित किराया देकर उनका उपयोग करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। रेंटोमोजो और फर्लेंको जैसी कंपनियां इस सुविधा को आसान बना रही हैं। फर्नीचर और घरेलू उपकरणों का रेंटल बाजार भी पीछे नहीं है। रेडसीर के अनुसार, यह बाजार अभी 33,500 करोड़ रु. का है। जानकारों का अनुमान है कि 2032 तक यह 46,000 करोड़ रु. के पार निकल जाएगा। यह नया ट्रेंड बताता है कि भारतीय परिवारों के लिए अब चीजों के मालिकाना हक से ज्यादा ‘सुविधा’ और ‘किफायत’ जरूरी हो गई है। इससे न केवल आर्थिक बोझ कम हो रहा है, बल्कि लाइफस्टाइल को अपग्रेड करना भी आसान हो गया है। एक स्टडी के मुताबिक, देश में औसत सब्सक्रिप्शन 13 महीने का होता है। देश में सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी की शुरुआत ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से हुई थी। इसी ने लोगों के बीच मासिक सब्सक्रिप्शन की आदत डाली। एक्सप्लेनर: चीन के बाद सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही हमारी सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी छोटे फर्नीचर 79 रु./माह से शुरू, कारें 600 रु./दिन पर हैं 1. किराए पर सामान लेने से क्या फायदा है? यह उन लोगों के लिए सबसे अच्छा है जो बार-बार शहर बदलते हैं या भारी निवेश के बिना अच्छी लाइफस्टाइल चाहते हैं। 2. आखिर ये किराया कितना किफायती है? यह बहुत सस्ता है। छोटे फर्नीचर ₹79/माह और अप्लायंसेज ₹149/माह से शुरू होते हैं। 1BHK का पूरा सेटअप भी ₹514-₹570 रु./माह के आसपास मिल सकता है। 3. डिलीवरी और इंस्टॉलेशन का क्या होता है? डिलीवरी और इंस्टॉलेशन का शुल्क चेकआउट पर अलग से जुड़ता है। बेड, गद्दे, फ्रिज और वॉशिंग मशीन का इंस्टॉलेशन आमतौर पर मुफ्त होता है। 4. क्या मेंटेनेंस की जिम्मेदारी ग्राहक की है? नहीं, सामान की मरम्मत और मेंटेनेंस की पूरी जिम्मेदारी कंपनी की होती है। 5. क्या कोई अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है? हर सब्सक्रिप्शन के साथ लगभग ₹1,000 का ‘डैमेज-वेवर’ चार्ज जुड़ता है। कंपनियों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। 6. क्या इन कंपनियों में कोई ऑफर होता है? कुछ कंपनियां पहले महीने के किराए पर किड्स फर्नीचर पर 22% (₹1,100 तक) की छूट जैसे शुरुआती ऑफर्स देती हैं। 7. कार सब्सक्रिप्शन का शुरुआती किराया? शॉर्ट-टर्म सेल्फ-ड्राइव में किराया ₹499/दिन, जबकि प्रीमियम एसयूवी में ₹999/दिन से शुरू है। आमतौर पर बजट कारों का रोजाना रेंट 600-800 रु. के बीच है। 8. लंबी अवधि में कार लेने का रेंट क्या है? लॉन्ग-टर्म सब्सक्रिप्शन के लिए किराया ₹15,000 प्रति माह से शुरू होता है। 9. कंपनियां क्या-क्या खर्च वहन करती हैं? कार की कीमत, रोड टैक्स, इंश्योरेंस और सर्विसिंग यानी ओनरशिप का झंझट कंपनी संभालती है। हालांकि इंश्योरेंस क्लेम में जो रकम कंपनी सेटल नहीं करती, वो पैसे और क्लेम-फाइलिंग चार्ज ग्राहक देते हैं। 10. ग्राहक को जेब से क्या-क्या देना होता है? ईंधन (पेट्रोल/डीजल), टोल टैक्स, पार्किंग और राज्यों की एंट्री फीस का भुगतान ग्राहक को खुद करना पड़ता है। 11. ये कंपनियां कितने शहरों में उपलब्ध हैं? ये कंपनियां देशभर के 21-30 से अधिक शहरों में सेवाएं दे रही हैं, जिनमें इंदौर, जयपुर, लखनऊ और चंडीगढ़ शामिल हैं। 12. सब्सक्रिप्शन बीच में बंद कर सकते हैं? हां, सब्सक्रिप्शन ट्रांसफर कर सकते हैं या सामान लौटा सकते हैं, पर अर्ली चार्ज है। 13. आरओ का सब्सक्रिप्शन कितने का है? आरओ खरीदने में 10,000-30,000 रु. खर्च होते हैं। लिवप्योर जैसी कंपनियां आरओ 429 रु./महीने के सब्सक्रिप्शन पर दे रहीं। इसमें मशीन, इंस्टॉलेशन, फिल्टर बदलना और सर्विसिंग भी शामिल होती है। 14. रेंटल कंपनियों तक कैसे पहुंच सकते हैं? ऑर्डर एप/साइट से बुक होते हैं। टीम घर पर डिलीवरी-इंस्टॉलेशन करती है। शहर बदलने पर सामान फ्री में शिफ्ट करते हैं। भारत में सालाना ग्रोथ 16.6% है… फ्यूचर मार्केट इनसाइट्स के मुताबिक, भारत की सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी हर साल करीब 16.6% बढ़ रही है। यह चीन (18%) के बाद दुनिया की सबसे तेज वृद्धि दरों में से एक है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में और ज्यादा कंपनियां ‘प्रोडक्ट बेचने’ के बजाय ‘सर्विस मॉडल’ पर काम करने के लिए मजबूर होंगी। लेकिन ये मॉडल हर जगह सफल नहीं… अमेरिका में कैडिलैक, ऑडी, बीएमडब्ल्यू और वॉल्वो जैसी कंपनियों ने कार सब्सक्रिप्शन सर्विस शुरू कीं, लेकिन ऊंची लागत और जटिल ढांचे के कारण अधिकांश स्कीम्स बंद करनी पड़ीं। चीन में कपड़ों की सब्सक्रिप्शन कंपनी वाईक्लोजेट भी इसी वजह से नहीं टिक सकी। इस मामले में ओटीटी सबसे सफल मॉडल रहा। बेहतर मौके खोजने वाले युवाओं में ट्रेंड बढ़ रहा है भास्कर एक्सपर्ट: संजय छाबड़ा- एमडी, लोटस इलेक्ट्रॉनिक्स हाल के वर्षों में सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी तेजी से बढ़ी है। लेकिन यह अब भी मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित है। दरअसल मौजूदा दौर में युवा लगातार बेहतर मौके की तलाश में रहते हैं। इसके चलते उन्हें कुछ ही साल के अंतर पर शहर बदलना पड़ता है। इसलिए वे घर के सामान खरीदने की बजाय किराए पर लेना पसंद करते हैं। खास तौर पर कोविड के बाद यह नया बिजनेस मॉडल ट्रेंड में आया है। हमारे आंकड़े कहते हैं कि 5 साल पहले तक 76% ग्राहक कैश में इलेक्ट्रॉनिक्स खरीदते थे। अब 20% ही कैश पेमेंट करते हैं। बाकी ग्राहक ईएमआई पर सामान लेते हैं। जाहिर है, उन पर मासिक किस्तों का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यदि सब्सक्रिप्शन इकोनॉमी बढ़ रही है तो ये स्वाभाविक ही है। लेकिन छोटे-मझोले शहरों में इस मॉडल ने अब भी जोर नहीं पकड़ा है।

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