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बुक रिव्यू- आपको रील्स नहीं, डोपामाइन की लत है:इस किताब में पढ़ें नोटिफिकेशन के जाल से बचने, ब्रेन को रीसेट करने के तरीके

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किताब- डोपामाइन डिटॉक्स (बेस्टसेलिंग बुक ‘डोपामाइन डिटॉक्स’ का हिंदी अनुवाद) लेखक- निक ट्रेंटन अनुवाद- अम्बुज कुमार खरे प्रकाशक- मंजुल मूल्य- 299 रुपए कुछ आदतें ऐसी होती हैं, जो धीरे-धीरे हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं, जैसे- शुरुआत में ये आदतें सामान्य लगती हैं, लेकिन इससे धीरे-धीरे हमारा फोकस और काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। निक ट्रेंटन की किताब ‘डोपामाइन डिटॉक्स’ ऐसी ही आदतों के पीछे काम करने वाले ‘डोपामाइन सिस्टम’ को समझाती है। डोपामाइन ब्रेन में बनने वाला एक न्यूरोट्रांसमीटर है। यह खुशी, प्रेरणा, इनाम का एहसास और किसी काम को दोबारा करने की इच्छा पैदा करने में अहम भूमिका निभाता है। किताब बताती है कि डोपामाइन को संतुलित करके हम फोकस, मोटिवेशन और मानसिक संतुलन को कैसे बेहतर कर सकते हैं। डोपामाइन एडिक्शन निक ट्रेंटन बताते हैं कि डोपामाइन को ‘हैप्पी हाॅर्मोन’ कहा जाता है, लेकिन इसकी भूमिका इससे कहीं ज्यादा है। यह हमारे ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम, मोटिवेशन और आदतों को प्रभावित करता है। जब हम लगातार सोशल मीडिया, गेम्स, जंक फूड या दूसरी हाई-स्टिमुलेशन चीजों के संपर्क में रहते हैं, तो ब्रेन उसी लेवल के एक्साइटमेंट का आदी हो जाता है। इसका असर यह होता है कि पढ़ाई, काम या किताब पढ़ने जैसी सामान्य एक्टिविटीज में पहले जैसा उत्साह महसूस नहीं होता। किताब की मुख्य बातें यह किताब मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटी है। लेखक का कहना है कि छोटे-छोटे बदलाव लंबे समय में हमारी जिंदगी पर बड़ा असर डाल सकते हैं। किताब की सबसे असरदार बात इस किताब की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेखक डोपामाइन को खत्म करने की नहीं, उसे संतुलित रखने की बात करते हैं। वे बताते हैं कि ‘समस्या डोपामाइन नहीं, बल्कि लगातार मिलने वाले इंस्टेंट रिवॉर्ड है।’ जब हमारा ब्रेन हर मिनट एक नया स्टिमुलेशन चाहता है, तब किसी एक चीज पर लगकर काम करना या किसी एक जगह पर लंबे समय तक ध्यान टिकाना मुश्किल हो जाता है। इस आदत को बदलने के लिए लेखक ने किताब में कुछ छोटे-छोटे कदम बताए हैं, जैसेकि- किताब का यही व्यवहारिक नजरिया इसे दूसरी सेल्फ-हेल्प बुक्स से अलग बनाता है। किताब के यादगार प्रसंग किताब में 1, 3 और 7 दिन के डोपामाइन डिटॉक्स प्लान का जिक्र सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक है। लेखक इसे कठिन चैलेंज की तरह नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। एक और दिलचस्प बात ‘माइक्रो रिजोल्यूशन’ की है। लेखक बड़े लक्ष्य तय करने की बजाय छोटे बदलावों से शुरुआत करने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि छोटी सफलताएं ब्रेन को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। किताब में ‘एनवायर्नमेंट डिजाइन’ का भी जिक्र है। लेखक कहते हैं कई बार हमारे आसपास का माहौल इच्छाशक्ति से ज्यादा असर डालता है। अगर फोन हर समय सामने रहेगा या नोटिफिकेशन लगातार आते रहेंगे, तो ध्यान भटकना स्वाभाविक है। इसलिए वे ऐसे माहौल की सलाह देते हैं, जहां डिस्ट्रैक्शन अपने आप कम हो जाए। ग्रैटीट्यूड का अभ्यास भी किताब का अहम हिस्सा है। लेखक के अनुसार, हर दिन उन चीजों के बारे में सोचना चाहिए, जिनके लिए हम आभारी हैं। यह गैटीट्यूड प्रैक्टिस ब्रेन को हर वक्त नए स्टिमुलेशन की तलाश से बाहर निकलने में मदद करती है। भाषा और लिखने का ढंग निक ट्रेंटन की भाषा सरल और सहज है। वे न्यूरोसाइंस जैसे विषय को भी कठिन वैज्ञानिक शब्दों में नहीं समझाते। लगभग हर अध्याय में छोटे उदाहरण दिए गए हैं, जिससे विषय समझना आसान हो जाता है। लेखक साइंटिफिक कॉन्सेप्ट्स को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ते हैं। वे स्क्रीन टाइम, नींद, खानपान और आदतों के बीच संबंध को आसान भाषा में समझाते हैं। कई जगह रिसर्च और व्यवहारिक सुझाव साथ-साथ चलते हैं। इससे किताब पढ़ते समय बोरियत महसूस नहीं होती। किताब की कमजोरियां यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? निक ट्रेंटन की यह किताब उन लोगों के लिए उपयोगी है, जिन्हें लगता है कि उनका ध्यान बार-बार भटकता है, फोन की आदत बढ़ गई है या लगातार व्यस्त रहने के बावजूद काम में मन नहीं लगता। लेखक का फोकस ऐसी लाइफस्टाइल बनाने पर है, जिसमें ब्रेन लगातार इंस्टेंट रिवॉर्ड का आदी न बने। ये किताब किन्हें पढ़नी चाहिए, ग्राफिक में देखिए किताब के बारे में मेरी राय करीब 150 पेज की यह किताब आसान भाषा में लिखी गई है और इसके सुझाव व्यवहारिक हैं। आज जब डिजिटल डिस्ट्रैक्शन लगभग हर उम्र के लोगों की समस्या बन चुका है, तब यह किताब पहले से ज्यादा प्रासंगिक लगती है। इसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि डोपामाइन को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे संतुलित रखने की जरूरत है। ……………………………………… ये भी पढ़ें… बुक रिव्यू- सफलता के लिए खुद को गलाना जरूरी नहीं:काम के घंटे नहीं, क्वालिटी जरूरी, प्रोडक्टिविटी बढ़ानी है तो ये किताब पढ़ें ‘स्लो प्रोडक्टिविटी’ एक ऐसी किताब है, जो काम और सफलता को देखने का हमारा नजरिया बदल सकती है। लेखक कैल न्यूपोर्ट ने लिखा है कि सिर्फ ज्यादा काम करने या हर समय व्यस्त रहने से ही सफलता नहीं मिलती है। पूरी खबर पढ़ें…

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