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प्रियदर्शन का कॉलम:नई पीढ़ी वॉट्सएप के दौर से इंस्टाग्राम के दौर में आ चुकी है

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-जी कहलाने वाले युवाओं के आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो हुआ ही, प्रधानमंत्री को यह भी समझ में आया कि इस पीढ़ी से जुड़ना है तो इंस्टाग्राम पर आना होगा। उन्होंने लगातार तीन दिन इंस्टाग्राम पर वीडियो जारी किए और अपने मंत्रियों को भी कहा कि वे इंस्टाग्राम पर आएं। यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री की बदलते माध्यमों पर इतनी गहरी नजर है और उसके अनुसार खुद को ढाल सकने की क्षमता भी। यह सच है कि नई पीढ़ी अब वॉट्सएप के दौर से बाहर आकर इंस्टाग्राम के दौर में दाखिल हो चुकी है। इन दोनों कालखंडों में एक गुणात्मक अंतर है। वॉट्सएप पर जो पीढ़ियां सक्रिय हैं, वे एक नकली इतिहास का बोझ लेकर चल रही हैं, तरह-तरह के दुश्मनों की तलाश में रहती हैं और अंततः उन्होंने इसे झूठ और नफरत फैलाने वाले माध्यम में बदल डाला है। परिवारों के वॉट्सएप समूहों, राजनीतिक दलों के आईटी सेल द्वारा प्रसारित संदेश और वीडियो- इन सबको देखिए तो सबमें बहुत तीखी अल्पसंख्यक विरोधी धारणा, उथली किस्म की धार्मिकता और अमूर्त सामाजिक चिंताएं मिला करती हैं। लेकिन इंस्टाग्राम वाली पीढ़ी इससे अलग है। वह अतीत के बेमानी बोझ से मुक्त है। वह नाचती-गाती है, मीम बनाती है, पिटती है तो रोती है और फिर अपनी जिद के साथ पिटने के लिए पहुंच जाती है। उसमें पुरानी पीढ़ियों वाला असुरक्षा बोध नहीं है और उसकी जगह एक गहरा और बेपरवाह किस्म का आत्मविश्वास है। वह अपना दफ्तर और अपनी दुनिया अपने कंधों पर लैपटॉप की शक्ल में लेकर चलती है और कॉफी हाउस से लेकर जंतर-मंतर तक पर फटाफट अपने काम भी पूरे जतन से निबटाती रहती है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन अनुशासित युवाओं को देखना एक अलग तरह का अनुभव था। वे जगह साफ रखने के लिए झाड़ू लगा रहे थे, कचरा उठा रहे थे, अपने पैसे से खाने-पीने का सामान लाकर बांट रहे थे और यहां तक कि आने-जाने वालों पर हाथ का पंखा भी झल रहे थे, ताकि गर्मी से निजात मिले न मिले, पर सबको लगे कि उनकी फिक्र की जा रही है। बहुत सारे लोगों को इस जेन-जी की भाषा पर ऐतराज है, जो एक हद तक उचित भी है। हमारी पीढ़ी जिन संस्कारों में पली है, उनमें गालियां हमारे कान लाल कर देती हैं। लेकिन इन बच्चों के जीवन में हमारे समय वाली नैतिकता नहीं है। बचपन से उनके हाथ में स्मार्टफोन है और किशोर होते-होते इस फोन पर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के सब्स्क्रिप्शंस हैं, जहां दुनिया भर की यौन-उच्छृंखलता वाली सामग्री मिलती है- गालियां भी। तो गालियों को लेकर उनके भीतर हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा अकुंठ भाव है- उन्हें सजावटी शराफत की परवाह नहीं है। फिर ऐसा भी नहीं है कि इस पीढ़ी के सारे के सारे बच्चे इस गाली-गलौज वाली भाषा में बात करते हैं। सच तो यह है कि जंतर-मंतर पर लगने वाले निन्यानवे फीसदी नारे और दिखने वाले इतने ही पोस्टर बहुत ही सूझबूझ और कल्पनाशीलता से लैस मिलते रहे। लेकिन जो एक फीसदी या उससे भी कम का हाशिए पर पड़ा तमाशा है, उसको कुछ इस तरह प्रचारित किया गया है कि यही जेन-जी की भाषा है। तो वॉट्सएप युग और इंस्टाग्राम युग का जो सबसे बड़ा अंतर है, वह यह कि वॉट्सएप पर अगर नफरत की दुकानें चलती थीं तो इंस्टाग्राम पर मोहब्बत के तराने गूंज रहे हैं। इस इंस्टाग्राम पीढ़ी ने हिंदू-मुसलमान वाले नैरेटिव को बुरी तरह नकार दिया है। जंतर-मंतर से आई रीलें देखिए तो यह बात बहुत खुलकर उभरती है कि इस पीढ़ी को साम्प्रदायिकता के खेल से मतलब नहीं है। इस ढंग से देखें तो यह आंदोलन पेपर-लीक के खिलाफ और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ज्यादा अपने समय और समाज के गहरे असंतोष को व्यक्त करता दिखा है। वॉट्सएप दौर ने जो छवियां बनाईं, उसको इंस्टाग्राम का दौर चूर-चूर करता दिख रहा है। यह कुछ के लिए राहत और कुछ के लिए चिंता की बात है। लेकिन नई पीढ़ी वॉट्सएप दौर से बाहर आकर इंस्टाग्राम के दौर में दाखिल हो चुकी है। और इन दोनों में गुणात्मक अंतर है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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