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पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा पैसे की कीमत नहीं समझता:दोस्तों को देखकर महंगे कपड़े-खिलौने मांगता है, उसे पैसे की वैल्यू कैसे सिखाएं?

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सवाल- हमारा बेटा 10 साल का है और हम एक मिडिल क्लास फैमिली हैं। हम अपने बेटे की जरूरतें पूरी करने की हर संभव कोशिश करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा हो रहा है, हर नई चीज को अपनी जरूरत समझने लगा है। कभी महंगे जूते, कभी नए खिलौने और कभी ब्रांडेड सामानों की डिमांड करता है। मना करो तो कहता है कि उसके दोस्तों के मम्मी-पापा तो सब दिलाते हैं। वो दूसरों से तुलना करने लगा है। उसे समझ नहीं कि पैसे मेहनत से कमाए जाते हैं। जीवन में हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती। वो अभी छोटा है। उसकी उम्र के हिसाब से ये बात हम उसे कैसे सिखाएं-समझाएं? एक्सपर्ट: रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी चिंता बिल्कुल वाजिब है। आपका बेटा अपने दोस्तों को देखकर नई-नई चीजें खरीदने की जिद कर रहा है। बहुत से माता-पिता इस स्थिति का सामना करते हैं। दरअसल 8-10 साल की उम्र में बच्चे पैसे की वैल्यू नहीं समझते। उन्हें सिर्फ इतना पता होता है कि जो चीज उन्हें पसंद है, वह उनके पास होनी चाहिए। उन्हें यह समझ नहीं होती कि पैसे कहां से आते हैं, कैसे कमाए जाते हैं या बजट कैसे बनाया जाता है। लेकिन अच्छी बात ये है कि यही वह समय है, जब बच्चे को पैसे की वैल्यू और सेविंग की आदत सिखाई जा सकती है। जब उसे अपनी जरूरतों और इच्छाओं में फर्क करना सिखाया जा सकता है। तो चलिए समझते हैं कि ये काम कैसे करें। बच्चे पैसों की वैल्यू क्यों नहीं समझते? बच्चे पैसे की वैल्यू इसलिए नहीं समझ पाते, क्योंकि उनकी दुनिया और हमारी दुनिया अलग होती है। उनकी सोच कुछ इस तरह काम करती है— 1. वे नहीं जानते, पैसा कहां से आता है- उन्हें सिर्फ इतना पता होता है कि पैसे से उनकी पसंद की चीजें खरीदी जा सकती हैं। वे अभी यह नहीं समझते कि हर रुपए के पीछे मेहनत, समय और जिम्मेदारी होती है। 2. पैसों की कमी का अनुभव नहीं- उनकी पढ़ाई, खाना, कपड़े, खिलौने और सारी जरूरतें माता-पिता पूरी कर देते हैं। इसलिए उन्हें यह एहसास नहीं हो पाता कि हर खर्च सोच-समझकर किया जाता है। 3. दूसरों को देखकर सीखना- दोस्तों के महंगे जूते, खिलौने, गैजेट्स या सोशल मीडिया पर दिखने वाली लाइफस्टाइल उन्हें आकर्षित करती है। ऐसे में वे भी उन चीजों को अपनी जरूरत समझने लगते हैं। 4. घर में पैसों के बारे में बात न होना- अगर बच्चे को कभी यह नहीं बताया जाता कि बजट कैसे बनता है, बचत क्यों जरूरी है और हर इच्छा तुरंत पूरी क्यों नहीं की जा सकती, तो वह पैसों की अहमियत सीख ही नहीं पाता। नॉर्मल है दोस्तों से तुलना करना बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर सीखते हैं। अगर किसी दोस्त के पास नया वीडियो गेम, महंगा बैग या नई साइकिल है, तो बच्चे में उसकी चाह जगना स्वाभाविक है। लेकिन यहां माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। अगर पेरेंट्स हर तुलना का जवाब नई चीजें खरीदकर देते हैं तो बच्चा पैसे की वैल्यू नहीं समझ पाता। आप उसे प्यार से समझा सकती हैं- इससे धीरे-धीरे बच्चा समझने लगता है कि तुलना जीवन का सही पैमाना नहीं है। पैसे की वैल्यू की शुरुआत घर से अक्सर पेरेंट्स बच्चों से पैसों के बारे में बात करने से बचते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चा अभी छोटा है। लेकिन सच यह है कि पैसे के बारे में सीखने की सबसे सही उम्र यही है। बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता, बल्कि मेहनत से कमाया जाता है। उदाहरण के लिए आप उससे कह सकती हैं- ध्यान रखें कि बातचीत का उद्देश्य बच्चे को डराना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदारी समझाना होना चाहिए। जरूरत और इच्छा का फर्क बच्चे को जरूरत और इच्छा का फर्क समझाने के लिए एक आसान-सी एक्टिविटी करें। किसी दिन उसके साथ 10-15 मिनट बैठें और एक कागज पर दो कॉलम बनाएं— ‘जरूरत’ और ‘इच्छा’। फिर उससे कहें कि रोजमर्रा की चीजों को इन दोनों कॉलम में बांटे। 1. पहले बच्चे से पूछें- किसी भी चीज का फैसला आप खुद न करें। उसे सोचने का मौका दें कि वह चीज किस कैटेगरी में आती है। 2. हर जवाब की वजह पूछें- अगर वह किसी महंगे जूते को ‘जरूरत’ कहता है, तो पूछें, “क्या तुम्हारे पास पहनने के लिए जूते नहीं हैं, या तुम्हें सिर्फ नया डिजाइन पसंद है?” 3. जरूरत और इच्छा का फर्क- बच्चे को बताएं कि जरूरत वे चीजें हैं, जिनके बिना काम नहीं चल सकता। इच्छा वे चीजें हैं, जिनके बिना भी काम चल सकता है या जिन्हें बाद में भी खरीदा जा सकता है। 4. शॉपिंग एक्टिविटी- खरीदारी के समय भी यही तरीका अपनाएं। जब भी बच्चा कोई नई चीज मांगे, उससे पहले पूछें- “यह जरूरत है या इच्छा?” इससे वह खुद धीरे-धीरे सोच-समझकर फैसला लेना सीखेगा। सेविंग समझाने का आसान तरीका जब बच्चा किसी खिलौने, गैजेट या दूसरी चीज की मांग करे, तो तुरंत ‘हां’ या ‘ना’ कहने की बजाय उसे कुछ आसान सवालों के जवाब देने के लिए कहें। इससे बच्चा अपनी जरूरत और इच्छा का आकलन करना सीखता है और बिना सोचे-समझे खरीदारी की आदत कम होती है। कुछ भी खरीदने से पहले बच्चे से खुद से ये तीन सवाल पूछना सिखाएं- ‘बचत’ सिखाने का तरीका ‘पॉकेट मनी’ पॉकेट मनी सिर्फ बच्चे को खर्च करने के लिए पैसे देना नहीं है। यह एक तरीका है, जिससे बच्चे पैसों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। अगर शुरू से सही आदतें सिखाई जाएं, तो बच्चा कम उम्र में ही बचत, प्लानिंग और अपनी इच्छाओं को रेगुलेट रखना सीख सकता है। पॉकेट मनी देते समय इन बातों का ध्यान रखें- फिक्स पॉकेट मनी- हर बार मांगने पर पैसे देने की बजाय हफ्ते या महीने की एक निश्चित पॉकेट मनी तय करें। खर्च और बचत दोनों- बच्चे से कहें कि पॉकेट मनी का एक हिस्सा अपनी जरूरतों के लिए खर्च करे और दूसरा हिस्सा गुल्लक या सेविंग बॉक्स में जमा करे। सेविंग टारगेट- बचत का टारगेट तय करें। अगर वह कोई खिलौना, किताब या दूसरी चीजें खरीदना चाहता है, तो उसे अपनी बचत से खरीदने के लिए प्रोत्साहित करें। अतिरिक्त पैसे- अगर पॉकेट मनी खत्म हो जाए, तो बच्चे को तुरंत एक्स्ट्रा पैसे न दें। इससे बच्चा प्लानिंग के साथ खर्च करना सीखता है। बच्चे को सेविंग्स सिखाने के और तरीके ग्राफिक में देखिए- खरीदारी में बच्चे को शामिल करना पैसे की समझ किताबों से नहीं, अनुभव से आती है। जब आप बाजार जाएं तो बच्चे को भी छोटे-छोटे फैसलों में शामिल करें। उससे पूछें- ऐसी बातचीत बच्चे को बजट और प्रिऑरिटी तय करना सिखाती है। बच्चे को डराना नहीं बच्चे को पैसे को लेकर डराएं नहीं और उससे कभी इस तरह के वाक्य न कहें– ऐसी बातें बच्चे के मन में पैसे को लेकर डर या अपराधबोध पैदा कर सकती हैं। बेहतर होगा कि आप संतुलित भाषा का इस्तेमाल करें, जैसेकि- कब चिंता की बात है? इन स्थितियों में ये थोड़ी चिंता की बात हो सकती है, अगर बच्चा- ऐसे में चाइल्ड काउंसलर से बात करना मददगार हो सकता है। अंत में यही कहूंगी कि पैसे की वैल्यू सिखाना सिर्फ बचत सिखाना नहीं है। यह बच्चे को धैर्य, जिम्मेदारी, संतोष और सही फैसले लेना सिखाना भी है। आपका बेटा अभी ऐसी उम्र में है, जहां वो ये आदतें आसानी से सीख सकता है। …………………. पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 13 साल की बेटी हकलाती है: बच्चे मजाक उड़ाते हैं, क्लास में कुछ बोलती नहीं, हमेशा चुप रहती है, हम उसे कैसे हेल्प करें? ‘द स्टटरिंग फाउंडेशन’ के मुताबिक, दुनियाभर में लगभग 1% यानी 8 करोड़ से ज्यादा लोग हकलाते हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह समस्या लगभग चार गुना ज्यादा होती है। करीब 5% बच्चे उम्र के किसी-न-किसी दौर में हकलाहट का सामना करते हैं। इनमें से लगभग 75% बच्चे बड़े होते-होते ठीक हो जाते हैं, जबकि करीब 1% में यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है। आगे पढ़िए…

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