किसी बात को मुहावरे में समझाने में तुलसीदास जी को महारत हासिल थी। गरुड़ जी से बात करते हुए उन्होंने कहा था- रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान, ज्ञानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान। राम जी के भजन बिना जो मोक्ष-पद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान होने पर भी बिना पूंछ और सींग का पशु है। मोक्ष का अर्थ यहां यह न ले लिया जाए कि मरने के बाद की कोई स्थिति। जीते जी भी मोक्ष मिल सकता है। दुर्गुणों से मुक्ति हो जाए, जीवन में शांति उतर आए, परमात्मा की अनुभूति बनी रहे तो यही मोक्ष है। लेकिन इसके लिए तुलसीदास जी की शर्त है कि भगवान का भजन करते रहना चाहिए। यहां उन्होंने पशु को पूंछ और सींग से जोड़ा है। सींग में आक्रमण है, पूंछ में सुरक्षा है। उनका कहना है कि यदि ये दोनों नहीं हैं तो वह पशु भी किसी काम का नहीं है। मनुष्य में भी ये दो खूबी होनी चाहिए। प्रतिस्पर्धा के युग में आक्रामक होना भी आवश्यक है, लेकिन विनम्रता बनी रहे। सुरक्षा भी करनी पड़ेगी। युवा पीढ़ी को इस पंक्ति को समझना होगा।



