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नीरजा चौधरी का कॉलम:मंदिर में ‘चोरी’ क्या समीकरणों को बदलेगी?

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अयोध्या के राम मंदिर से धन की कथित चोरी का मामला अभूतपूर्व है। इसने भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों तक को स्तब्ध कर दिया है। यह सामान्य अर्थों में किसी मंदिर के चढ़ावे की चोरी का मामला नहीं है। पूजा स्थलों पर चोरी की घटनाएं आमतौर पर होती रही हैं और लोग अकसर उन्हें सहन भी कर लेते हैं। लेकिन राम मंदिर अलग है। यहां चढ़ावे की राशि बहुत बड़ी थी। दिल्ली के निकट रहने वाले उस किसान जैसे लाखों लोग होंगे- जिसने उदासी भरे स्वर में कहा था कि- मंदिर खुलने के तुरंत बाद जब मैं दर्शन के लिए गया था, तब अपना सोने का कड़ा चढ़ाया था, जिसकी उस समय कीमत कम से कम ढाई लाख रुपये थी। उस अर्पण के पीछे एक भावना थी। इस क्षति की भावना केवल धन ठगे जाने तक सीमित नहीं है। यह तब और अधिक विचलित करती है, जब इसे आस्था के साथ विश्वासघात के रूप में देखा जाता है। और यह भावना तब और गहरा जाती है, जब वह अर्पण भगवान राम के नाम पर किया गया हो, जिनके प्रति भारत के बड़े हिस्से में करोड़ों लोगों के मन में अगाध श्रद्धा है। हम नहीं भूल सकते कि 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से दिल्ली तक अपनी प्रसिद्ध रथयात्रा शुरू की थी और बिहार में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, तब राम मंदिर निर्माण के विचार ने पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में किस तरह की भावनाएं जगाई थीं। संघ और भाजपा के अनेक लोगों ने इसे देश में आध्यात्मिक पुनर्जागरण की शुरुआत बताया था। लाखों हिंदुओं के लिए राम मंदिर का निर्माण उनकी पहचान के पुनर्पुष्टि के लिए चले ‘500 वर्षों के संघर्ष’ की परिणति था। ऐसे में जब यह पता चलता है कि इसके पीछे नोट और वोट का संघर्ष था, तो जीवन में मोहभंग की इस जैसी पीड़ादायक अनुभूतियां कम ही हो सकती हैं। संघ के कुछ पदाधिकारियों ने तो (निजी चर्चा में) इस मामले को 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद से सामने आई सबसे बड़ी घटना बताया है। संघ की विचारधारा से आप सहमत हों या नहीं- सूखा, बाढ़, सुनामी या किसी राष्ट्रीय आपदा के दौरान उसके स्वयंसेवकों द्वारा किए गए कार्यों के कारण समाज के अनेक वर्गों में उसे सम्मान प्राप्त रहा है। जयपुर के एक गांव के एक पैथोलॉजिस्ट- जो संघ और भाजपा के समर्थक हैं- ने मुझसे कहा कि ‘भाजपा एक राजनीतिक संगठन है, इसलिए वहां इस तरह की घटना को किसी हद तक समझा जा सकता है, लेकिन संघ में…!’ इतना कहकर उन्होंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया, लेकिन उनकी असहजता और निराशा स्पष्ट थी। यह तथ्य कि विवाद के केंद्र में रहे श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अधिकांश सदस्य या तो संघ के प्रचारक थे या उससे जुड़े हुए थे, स्वाभाविक रूप से इस संगठन की असहजता को और बढ़ाता है। ऐसा खुलासा उस समय होना भी संघ के लिए अनुकूल नहीं रहा है, जब वह अपने अस्तित्व के 100 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और उसने ‘नए मनुष्य के निर्माण’ को अपना लक्ष्य निर्धारित किया है। हाल के महीनों में संघ का नेतृत्व उन सामाजिक वर्गों तक भी पहुंच बनाने का प्रयास कर रहा था, जिनसे पहले उसका संपर्क नहीं था। ऐसे में ताज्जुब नहीं कि जनाक्रोश को देखते हुए संघ और भाजपा अब डैमेज-कंट्रोल की स्थिति में हैं। शुरुआती हिचकिचाहट के बाद संघ नेतृत्व ने इस घटना के विरोध में अपनी बात रखी है। धन के कथित दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इस घटना की निंदा की है और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है। ट्रस्ट की हालिया बैठक में भी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक पेशेवर सीईओ की नियुक्ति सहित आवश्यक प्रक्रियाएं लागू करने का निर्णय लिया गया। ट्रस्ट की बैठक में उसके महासचिव चम्पत राय, जो संघ प्रचारक हैं और वर्षों से विहिप से जुड़े रहे हैं, ट्रस्टी अनिल मिश्रा तथा आमंत्रित सदस्य गोपाल राव के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए। ये इस्तीफे मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट और चम्पत राय के पूर्व ड्राइवर सहित आठ लोगों की गिरफ्तारी के बाद लिए गए थे। हालांकि एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से चम्पत राय का नाम नहीं है। चम्पत ने कहा है कि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही वह अपना पक्ष रखेंगे। स्पष्ट है कि इस पूरे घटनाक्रम से संघ की छवि को झटका लगा है। उसे आशंका है कि इससे ‘हिंदुत्व परियोजना’ के प्रति भी मोहभंग की भावना पैदा हो सकती है। यह तो खैर नहीं माना जा सकता कि अयोध्या के मामले से असंतुष्ट मतदाता स्वतः विपक्षी दलों की ओर रुख कर लेंगे, भले ही समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला बोलने में कोई देर नहीं की है। लेकिन चूंकि अयोध्या कभी विपक्ष का मुद्दा नहीं रहा, इसलिए भाजपा के अनेक समर्थक चुनाव के समय घर बैठने का फैसला भी कर सकते हैं। लेकिन इससे भी विपक्ष को लाभ ही मिलेगा। क्या यह मामला यूपी और राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक विमर्श को बदल सकता है? अब तक विपक्ष यह नहीं समझ पाया है कि राम मंदिर के इर्द-गिर्द निर्मित भाजपा के हिंदू राष्ट्रवाद के विमर्श का मुकाबला कैसे किया जाए। राम मंदिर भाजपा की वह महत्त्वाकांक्षी परियोजना बन गया था, जिसने उसे सत्ता तक पहुंचाया। इसके परिणामस्वरूप हुए हिंदू एकीकरण ने पार्टी को भारत के बड़े हिस्से में अपना विस्तार करने में मदद की है। संघ और भाजपा इसे ‘एक हजार वर्षीय सभ्यतागत परियोजना’ के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अब योगी आदित्यनाथ क्या निर्णय लेते हैं। यद्यपि तकनीकी रूप से वे ट्रस्ट के प्रबंधन से जुड़े नहीं हैं, फिर भी वे यूपी में भाजपा सरकार के मुखिया हैं। लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री चुने जाने पर योगी पार्टी के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शामिल हो सकते हैं, लेकिन यदि भाजपा यूपी में हार जाती है या केवल मामूली बढ़त के साथ सत्ता में लौटती है, तो उनका दावा कमजोर पड़ सकता है। यद्यपि संघ के अनेक लोग उनके पक्ष में हैं और उनका प्रभाव केवल यूपी तक ही सीमित नहीं है। यह लोगों की आस्था के साथ विश्वासघात माना जा रहा है
क्षति की भावना धन ठगे जाने तक सीमित नहीं है। यह तब और अधिक विचलित करती है, जब इसे आस्था से विश्वासघात के रूप में देखा जाता है। और यह भावना तब और गहराती है, जब वह अर्पण राम के नाम पर किया गया हो, जिनके प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)

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