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नवनीत गुर्जर का कॉलम:जेन-जी के बाद जेन-अल्फा के आंदोलन

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बड़े दिन हुए!
कहना चाहिए सालों बीत गए, कोई आंदोलन इस देश ने नहीं देखा था।
कम से कम जेन-अल्फा ने तो नहीं ही देखा था। अब वही जेन-अल्फा आंदोलन पर उतर आया है! जेन-जी ने जब से जंतर-मंतर और रांची की सड़कों पर अलख जगाई, अल्फा में भी जोश आ गया। जेन-अल्फा वो हैं, जो 2013 से 2024 के दरमियान अवतरित हुए हैं। ये दरअसल छोटे-छोटे स्कूली बच्चे हैं। इनकी मांगें राजनीतिक नहीं। सामाजिक भी नहीं। वे सिर्फ अपने स्कूल तक सड़क मांग रहे हैं। या क्लास रूम में पंखों, बेचों की सुविधा मांग रहे हैं। छोटे-छोटे ही सही, आंदोलन कर रहे हैं।
शांतिपूर्ण। सौहार्दपूर्ण! हाल ही में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। फतेहपुर, उत्तरप्रदेश के सरकारी इंटर कॉलेज के बच्चों ने बिजली, पंखे, पानी आदि की व्यवस्था के लिए प्रदर्शन किया और बाकायदा एआई से बनाए गए पोस्टर, प्लेकार्ड का इस्तेमाल भी किया। शिक्षा अधिकारियों को तमाम व्यवस्थाओं के लिए लिखित आश्वासन देना पड़ा। राजस्थान में छात्रों ने शिक्षकों की कमी, खराब स्कूल भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रदर्शन किया। उनका नारा था- “पढ़ने के लिए ठीक स्कूल और शिक्षक दो।’
इसी तरह बिहार में भी सरकारी स्कूल के बच्चों ने बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र में तो स्कूली छात्राओं ने खराब सड़क का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला और वायरल कर दिया। इसे जेन-अल्फा की डिजिटल तरीके से अपनी मांग रखने की मिसाल माना गया।
सबसे ताजा मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर का है। यहां चंद्रपुर के स्कूली बच्चे हाथ में तिरंगा लिए पांच किलोमीटर दूर कलेक्टर कार्यालय पहुंच गए। मांग थी स्कूल तक पक्की सड़क बनाई जाए। बच्चों ने लगभग पांच घंटा धरना दिया। कुछ बच्चे तो डीएम कार्यालय में भी घुस गए थे। इन सभी प्रदर्शनों की खास बात ये रही कि बच्चों ने कहीं भी कोई राजनीतिक नारेबाजी नहीं की। उन्होंने सीधे अपनी मूलभूत मांगों पर फोकस रखा और अपने आंदोलन या प्रदर्शन को वहीं तक सीमित रखा।
संकेत साफ है- इनकी लड़ाई फिलहाल किसी केंद्र या राज्य सरकार से नहीं है, लेकिन प्रशासन, खासकर जिम्मेदार अफसरों को सावधान हो जाना चाहिए।
अब उनकी मनमानी नहीं चलेगी। ढीलपोल नहीं चलने वाली।
सही भी है! देश के कई राज्यों के कई इलाकों में आज भी सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर है। बच्चे कभी पेड़ के नीचे पढ़ने को विवश हैं तो कहीं उन्हीं जर्जर भवनों में, जो कभी भी गिरने को तैयार खड़े हैं।
जिम्मेदार अफसर न तो इन स्कूलों को कभी देखने जाते और न ही इनके सुधार या मरम्मत पर ध्यान देते हैं। सड़कों के हाल तो ऐसे हैं कि आप समझ ही नहीं पाते कि ये गड्ढे हैं या सड़क! अफसरों के इलाकों में बनी-बनाई, चिकनी-चुपड़ी सड़क पर भी महीने-दो महीने में पोता फिर जाता है, जबकि सामान्यजन के इलाकों की कोई कभी सुध ही नहीं लेता।
लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा!
जेन-जी के बाद अब जेन-अल्फा अपनी ताकत दिखाने पर आमादा हो चुकी है। वो किसी की सुनने वाली नहीं है। कारण साफ है- उसकी कोई कमजोरी नहीं है। न इनकम टैक्स वालों का डर, न ईडी वालों का भय।
चूंकि इन बच्चों का कोई राजनीतिक हित नहीं है, इन्हें किसी पद या कुर्सी की लालसा नहीं है, इसलिए कोई इनमें फूट भी नहीं डाल सकता। एक अदद नौकरी के लिए वर्षों का संघर्ष और अंत में निराशाजनक लगने वाली इस व्यवस्था में 1990 से पहले जन्मे लोग तो जी लिए। उन्होंने हर तरह की पीड़ा सह भी ली और अपने संघर्षमय जीवन को किसी तरह आत्मसात भी कर लिया। लेकिन जेन-जी और जेन-अल्फा में वैसा धैर्य नहीं है। वे सहन करने और करते रहने वालों में से नहीं हैं!
कुल मिलाकर, यह व्यवस्था को सुधारने का वक्त है। अफसरों के सुधर जाने का वक्त है। अगर समय रहते ये सब सुधार नहीं हुए तो जेन-अल्फा सबको सुधार देगी! यह व्यवस्था सुधारने का वक्त
1990 से पहले जन्मे लोगों ने हर तरह की पीड़ा सह भी ली और अपने संघर्षमय जीवन को किसी तरह आत्मसात भी कर लिया, लेकिन जेन-जी और जेन-अल्फा सहन करने और करते रहने वालों में से नहीं हैं। यह व्यवस्था को सुधारने का वक्त है। अगर समय रहते सुधार नहीं हुए तो जेन-अल्फा सबको सुधार देगी।

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