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नवनीत गुर्जर का कॉलम:ई-20 सरकार है, हम थाली के बैंगन

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ई-20 ऐसा पेट्रोल है, जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। देशभर के पंपों पर अब ये एथेनॉल मिक्स पेट्रोल ही मिल रहा है। एथेनॉल दरअसल, गन्ने, मक्का और कुछ अन्य कृषि उत्पादों से बनता है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के पीछे सरकार तीन मुख्य वजहें बताती है। पहली, प्रदूषण कम करना। दूसरी, कच्चे तेल के आयात में कमी करना और तीसरी, किसानों की आय बढ़ाना। प्रदूषण कम करने का तर्क सही हो सकता है, लेकिन कच्चे तेल का आयात घटता है तो इस एथेनॉल मिक्स पेट्रोल के दाम क्यों नहीं घटे? यह तो सरकार भी मान रही है कि इस पेट्रोल से गाड़ियों का माइलेज कम हो रहा है। इस्तेमाल करने वालों का कहना है कि गाड़ियों का एवरेज लगभग तीन से सात प्रतिशत घट रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इस मिक्स पेट्रोल के कारण जो थोड़े पुराने वाहन हैं, उनके इंजन पर बुरा असर हो सकता है। इस तरह के वाहनों के लिए दूसरा कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा गया है। जहां तक किसानों का सवाल है- उनका गन्ना कौन-सा दोगुनी कीमत पर बिक रहा है? वे तो वर्षों से अपना सारा गन्ना बेच ही रहे हैं। वो भी कम से कम दाम पर। वैसे भी एथेनॉल बड़ी मात्रा में अमेरिका से आयात किया जा रहा है। 2024 का आंकड़ा ही लें तो भारत ने 67.98 करोड़ लीटर एथिल अल्कोहल आयात किया था, जिसमें करीब 92 प्रतिशत यानी 62.29 करोड़ लीटर केवल अमेरिका से आया था। सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिक्स पेट्रोल के खिलाफ उसके पास कोई शिकायत नहीं आई है। हम जो इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं, दरअसल थाली के बैंगन हैं। हमारा कोई पक्ष ही नहीं है। मत ही नहीं है। कोल्हू के बैल की तरह घूमते जा रहे हैं बिना सिर उठाए। पीछे से कोड़े भी पड़ रहे हैं, लेकिन मजाल कि उफ भी कर दें! जो सरकार कर दे वही सच! जो सरकार कह दे वही ब्रह्मवाक्य! हमें न किसी तरह की महंगाई से फर्क पड़ता, न किसी तरह के गलत निर्णय से! दरअसल, ठहरकर, रुककर सोचने का हमारे पास वक्त ही नहीं है। सचाई तो ये है कि हम चेहरे देखकर तिलक करने के आदी हो चुके हैं। मुद्दों पर न तो हम बात करना चाहते और न ही उन्हें छूना चाहते। दरअसल, मुद्दों पर बात करने के लिए पढ़ना जरूरी होता है। उससे हमारा कोई वास्ता ही नहीं रहा। हम इंस्टाग्राम, फेसबुक और वॉट्सएप के मुरीद हो चुके हैं। यहां जो कोई, जो कुछ भी कह देता है, उसी को सच मान लेना हमारी फितरत हो गई है। हम अपने बच्चों को भी किताबों से बुरी तरह दूर करते जा रहे हैं। किसी ने कहा- गांधी जी ऐसे थे, हमने मान लिया। अब कोई कह रहा है गांधी वैसे थे, हमने इसे भी मान लिया। एक लंगोटी में पूरा जीवन काट देने वाली इस महान आत्मा के बारे में हमने कभी कुछ पढ़ना चाहा ही नहीं। पढ़ भी नहीं पाए। यही सब नेहरू जी के बारे में भी हुआ। ठीक है, अब का दौर भी महान है और इसका कोई मुकाबला नहीं हो यह भी संभव हो, लेकिन गांधी-नेहरू का दौर, तब की परिस्थितियां और उन हालात के बीच देश को खड़ा करना, खड़ा रखना कोई मामूली बात थी क्या? जाने क्यों हम पढ़े-लिखे बिना तुलनाओं में चले जाते हैं! कुल मिलाकर बात ये है कि हमें किसी से कोई मतलब नहीं रहा। ज्वलंत मुद्दों से तो बिलकुल नहीं। खैर, बात ई-20 की हो रही थी। एक केंद्रीय मंत्री कह रहे हैं कि एथेनॉल तो वर्षों से मिला रहे हैं। तब कारों को नुकसान क्यों नहीं हुआ? वर्षों से मिला रहे होंगे- दो-चार प्रतिशत। अब तो पूरा 20 प्रतिशत मिला दिया। अब तो नुकसान जितना भी हो, होगा ही। आखिर तो चीजों का फायदा या नुकसान उनकी मात्रा पर ही निर्भर होता है! उस मात्रा पर बात क्यों नहीं करते!

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