जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस बर्बरता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है. जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्णायक जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज (या किसी हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) और डीजीपी स्तर के पूर्व पुलिस अधिकारियों की देखरेख में एक ‘हाई पावर कमेटी’ गठित करने का आदेश दिया है.
अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि सभ्य समाज में पुलिस की ऐसी बर्बरता और बल प्रयोग को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया, “ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त करने वाले लोगों में हम सबसे आखिरी व्यक्ति होंगे.” कोर्ट ने माना कि छात्र कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे थे. उनके उद्देश्य और कठिन परिश्रम को समझा जाना चाहिए.
छात्रों को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की है कि आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को रद्द किया जाएगा. यदि राज्य सरकारें या पुलिस इन्हें वापस नहीं लेती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करके इन मुकदमों को खुद रद्द कर देगा. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि गंभीर अपराधों जैसे हत्या या बलात्कार जैसी हिंसक गतिविधियों में शामिल असामाजिक तत्वों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट की गई. सुप्रीम कोर्ट अब धरना-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल प्रयोग को नियंत्रित करने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.


