1960 के दशक में मेरे पिता नागपुर रेलवे स्टेशन के कैटरिंग सुपरवाइजर के तौर पर कार्यरत थे। उनके पास श्रीनिवासन नाम के एक शेफ काम करते थे, जिनसे उनका स्थायी विवाद रहता था। दरअसल, वड़ा या इडली का वजन भारतीय रेलवे द्वारा प्रिस्क्राइब्ड वजन से कम होता था। पहले उन्होंने शेफ को समझाने की कोशिश की, जिसने अनिच्छा से यह बात मान भी ली, लेकिन यह चलन जारी रहा। इस प्रक्रिया में कुछ और लोग भी शामिल थे। मेरे पिता पूरी व्यवस्था से नहीं लड़ सकते थे, लेकिन वे इस मसले को उच्चाधिकारियों तक पहुंचाते रहे। उनका विवाद गंभीर होता, इससे पहले ही पिता ने पैसेंजर रिजर्वेशन विभाग में ट्रांसफर का आवेदन कर दिया। उच्चाधिकारियों को भी इस पूरे ‘माफिया’ से लड़ने के बजाय पिताजी का पसंदीदा विभाग में ट्रांसफर करना ज्यादा आसान लगा। एक दिन मुझे यह कहानी सुनाते हुए उन्होंने कहा कि ‘ग्राहकों को धोखा देकर मैं भी पाप का भागीदार बन गया, जो मैं कभी नहीं चाहता था। ट्रांसफर के बाद ही मैं चैन से सो पाया।’ हमारे पूर्वजों का भोजन को लेकर एक खूबसूरत नजरिया था। उनका मानना था कि किसी भूखे को खाना खिलाना सिर्फ मेहमाननवाजी नहीं, बल्कि पुण्य कमाने का एक तरीका भी है, जो जिंदगी के बाद भी काम आएगा। हममें से कई लोग आज भी इस नेक विचार को मानते हैं। खासकर आज यह सोच और प्रासंगिक हो जाती है, जब लोगों को खाना खिलाना एक विशाल कारोबार बन चुका है। खाने से कमाई करना कोई गलत बात नहीं। असल में तो यह सबसे जायज कारोबारों में से एक है, क्योंकि खाने की जरूरत सभी को होती है। लेकिन फूड बिजनेस की एक जिम्मेदारी है, जो शायद दूसरे कई कारोबारों में नहीं होती। जब कोई आपका बनाया खाना खाता है, तो वह अपनी सेहत को लेकर आप पर भरोसा करता है। कर्नाटक के रेलवे स्टेशनों पर हाल ही में हुई फूड सेफ्टी जांच को देखकर मेरे दिमाग में यह विचार आया, क्योंकि यह याद दिलाता है कि जब इस जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया जाता है तो क्या होता है। अधिकारियों को जांच में एक्सपायर्ड दूध-दही, अखबारों में पैक खाना, अनुपयुक्त कंटेनरों में चटनी, सब्जियों में फफूंद और गैर-अनुमत रंगों के संदिग्ध इस्तेमाल के मामले मिले। महाराष्ट्र में भी ऐसी ही फूड सेफ्टी छापेमारी में एक्सपायर्ड और घटिया उत्पाद, खराब साफ-सफाई और फूड हैंडलिंग में गंभीर खामियां मिलीं। कोई रेल यात्री उस स्टेशन का नाम भूल सकता है, जहां से उसने नाश्ता खरीदा। लेकिन वहां के खाने से हुई पेट की खराबी को वह शायद ही कभी भूल पाए। दूसरी ओर, गुणवत्तापूर्ण खाना किसी फूड बिजनेस को ज्यादा मुनाफा दिला सकता है। ग्राहक उन जगहों को याद रखते हैं, जहां वे बिना डर के खाना खा सकते हैं। परिवार भरोसेमंद रेस्तरां में बार-बार जाते हैं। ट्रैवलर्स भरोसेमंद फूड आउटलेट्स को रिकमेंड करते हैं। बिजनेस के नजरिए से देखें तो साफ किचन और सुरक्षित खाना किसी ब्रांड का सबसे मजबूत विज्ञापन बन सकता है। जो व्यक्ति बेहतर सामग्री में निवेश करता है, किचन साफ रखता है, खाना सही-से स्टोर करता है, कर्मचारियों को प्रशिक्षण देता है और गुणवत्ता से समझौता नहीं करता, उसका खर्च ज्यादा हो सकता है लेकिन वह शॉर्ट-टर्म मार्जिन से कहीं ज्यादा कीमती चीज बना रहा होता है- वह है भरोसा। और मुझे यह कहने की जरूरत नहीं कि भरोसा कैसे पैसे को आकर्षित करता है। लेकिन एक और तरीके का रिटर्न है, जिसे हमारे पूर्वज हमसे बेहतर समझते थे। अगर आपके कारोबार से रोजाना हजारों लोगों का पेट भरता है तो शायद आप सिर्फ खाना नहीं बेच रहे हैं। आप ऐसा काम कर रहे हैं, जिसका लाभ-हानि से परे एक मानवीय मूल्य भी है। एक रेलवे वेंडर की कल्पना कीजिए, जो किसी भूखे यात्री को गर्म, ताजा और सुरक्षित खाना देता है। एक रेस्तरां मालिक, जो सुनिश्चित करता है कि किसी मजदूर, स्टूडेंट, परिवार या बुजुर्ग यात्री को उचित कीमत पर पौष्टिक खाना मिले। कैश रजिस्टर में लेन-देन दर्ज होता है, लेकिन जिंदगी कुछ और भी दर्ज करती है- इसे ‘पुण्य’ कहते हैं। फंडा यह है कि अगर आप मानते हैं कि आपको अपने ग्राहकों को सबसे हाइजीनिक खाना परोसना चाहिए, तो ‘जिंदगी के बाद भी प्रॉफिट’ शायद वास्तव में सफल फूड बिजनेस की सबसे सार्थक परिभाषा होगी।



