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एन. रघुरामन का कॉलम:गलतियों की दुनिया में इंसानों का कंप्यूटर बन जाना पागलपन है

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हर कंप्यूटर गलतियों को काले या सफेद की तरह देखता है। यानी या तो गलती है, या नहीं है। या तो शून्य है, या 100। उनकी दुनिया में ‘थोड़ी-सी गलती’ जैसी चीज नहीं होती। यह भी नहीं देखा जाता कि ‘गलती के लिए जिम्मेदार कौन है।’ न यह माना जाता है कि ‘कंप्यूटर में भी गड़बड़ी हो सकती है, जिसे गलती कहा जा सकता है।’ कंप्यूटर मानते हैं वे कभी गलती नहीं करते, इसलिए सामने आई गलतियों की जिम्मेदारी इंसानों पर डाल दी जाती है। अगर आप इस थ्योरी से संतुष्ट नहीं हैं तो महाराष्ट्र के नागपुर निवासी एम. रमाकांत से पूछ लीजिए, जिन्होंने हाल ही में बेहद कठिन तरीके से यह सबक सीखा। 23 जून को रात 8 बजे वे 22691 केएसआर बेंगलुरु-हजरत निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस में चढ़े। बेंगलुरु में नौकरी छोड़ने के बाद यह 24 वर्षीय युवक अपने गृह नगर नागपुर लौट रहा था। ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर (टीटीई) के टिकट जांचने के लिए आने तक यात्रा सामान्य थी। सेकंड एसी में रिजर्व बर्थ पर बैठे रमाकांत ने टीटीई के पूछने पर फोन पर अपना ई-टिकट दिखाया। फिर जो हुआ, उससे वह हैरान रह गए। टीटीई ने रमाकांत से कहा कि वे उसके साथ फर्स्ट एसी कोच में चलें। वहां एक और टीटीई आ गया। दोनों ने रमाकांत से कहा कि उनका टिकट अमान्य है और ‘उन्हें किराए से दोगुना जुर्माना देना पड़ सकता है।’ टिकट में ट्रेन नंबर, डेस्टिनेशन, नाम और जेंडर सही थे, लेकिन उनकी उम्र 24 की जगह ‘1’ दर्ज हो गई थी। शुरुआत में रमाकांत को लगा कि शायद सिस्टम में कोई गड़बड़ है, क्योंकि टिकट उन्होंने खुद बुक किया था। वे सोच में पड़ गए कि अपनी उम्र वह ‘1’ कैसे लिख सकते हैं। लेकिन ई-टिकट जांचा तो अहसास हुआ कि यह एक गलती थी। उनकी तरफ से हुआ टाइपिंग एरर भी हो सकता है। रमाकांत ने उम्र और पहचान साबित करने के लिए आईडी-प्रूफ दिखाया। लेकिन अधिकारियों का कहना था कि उम्र की जानकारी मेल नहीं खा रही है, इसलिए टिकट अमान्य है। रमाकांत ने तर्क दिया कि उन्होंने वयस्क यात्री का किराया चुकाया है और उम्र ‘1’ बताकर कोई रियायत नहीं ली। लेकिन टीटीई बात सुनने या तर्कसंगत ढंग से सोचने को तैयार ही नहीं थे। बहस के बाद उन पर ‘विदाउट टिकट’ यात्रा करने के लिए 7,035 रुपए का जुर्माना लगाया गया, जिससे उनका यात्रा खर्च 10 हजार रुपए से अधिक हो गया। कोई चारा नहीं था तो रमाकांत ने यूपीआई से जुर्माना भर कर रसीद ले ली। 24 जून को नागपुर पहुंचने के बाद उन्होंने जुर्माने के रिफंड के लिए ‘रेल मदद’ पर शिकायत दर्ज कराई। लेकिन शिकायत एक ही दिन में बंद कर दी गई। रेलवे ने जवाब में कहा कि टिकट चेकिंग स्टाफ ने नियमों के अनुसार ही कार्रवाई की है। क्लोजिंग रिमार्क में लिखा गया कि ‘टिकट जांच में पाया गया कि उम्र की जानकारी गलत दी गई थी और यात्रा कर रहे व्यक्ति की वास्तविक उम्र से मेल नहीं खाती थी।’ रेलवे ने कहा कि टिकट बुकिंग के बाद यात्रियों को जानकारी जांचनी होती है और यदि कोई गलती हो तो चार्ट बनने और यात्रा शुरू होने से पहले पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (पीआरएस) काउंटर पर उसे ठीक करवाना होता है। इस मामले में ट्रेन में चढ़ने से पहले इस विसंगति को ठीक नहीं कराया गया था। अब मेरा सवाल है कि अगर कोई वास्तविक गलती भी है तो यात्री को अलग-से फर्स्ट एसी कोच में ले जाकर क्यों घेरा गया? आईआरसीटीसी वेबसाइट ने एक साल के बच्चे का टिकट कैसे बुक कर लिया, कैसे उसे अकेले यात्रा की अनुमति दी और कैसे उससे वयस्क यात्री का किराया वसूल लिया? अगर यह तकनीकी गड़बड़ी थी तो क्यों टीटीई ने इंसानों की भांति तर्कसंगत व्यवहार नहीं किया और क्यों मामले को सलाह के लिए वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं लेकर गए? अब इस कॉलम के पाठक के रूप में आप समझ गए होंगे कि ऐसी दुनिया में आपको कौन-सी सावधानी बरतनी चाहिए, जहां इंसान अतार्किक होते जा रहे हैं। फंडा यह है कि जब कंप्यूटर गलती करते हैं, तो उसे गड़बड़ी कहा जाता है। इंसान ही होते हैं, जो उसे ठीक करते हैं क्योंकि माना जाता है कि हम तर्कसंगत हैं। इस तर्कसंगतता का खत्म होना हम इंसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

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