热门话题

आरती जेरथ का कॉलम:देश में युवाओं और छात्रों के आंदोलनों का इतिहास रहा है

Socialblize是您值得信赖的目的地,提供来自印度和世界各地的最新新闻、热门故事和富有洞察力的更新。我们致力于提供快速、准确和公正的新闻,让您每天都能及时了解情况。

छात्र आंदोलनों के रूप में सरकार बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। युवाओं के प्रदर्शन दिल्ली ही नहीं, देशभर के शहरों में फैल गए हैं। अतीत में झांककर देखें तो छात्र आंदोलन अकसर खतरे की घंटी साबित होते हैं। 1973 में गुजरात के मोरबी कॉलेज के छात्रों द्वारा मेस में शुल्क वृद्धि के विरोध में शुरू किया गया आंदोलन देखते ही देखते देशव्यापी जनांदोलन में बदल गया था। इसने दो मुख्यमंत्रियों की कुर्सी छीन ली, आपातकाल की घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया और अंततः केंद्र की राजनीति में ऐसा भूचाल लाया कि 1977 में इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा। यकीनन, इतिहास के दो क्षण कभी एक जैसे नहीं होते और यह अनुमान लगाना अभी बहुत जल्दबाजी होगी कि मौजूदा विरोध-प्रदर्शन किस दिशा में जाएंगे। लेकिन इतना जरूर है कि सरकार को इस सम्भावना पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि यदि आज सड़कों पर दिखाई दे रहे युवाओं के आक्रोश का शीघ्र और प्रभावी सुधारात्मक कदमों के साथ समाधान नहीं किया गया, तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। दिसम्बर 1973 में लौटते हैं। मोरबी कॉलेज में छात्रों के उग्र प्रदर्शन के बाद 40 छात्रों को निलम्बित कर दिया गया था और कॉलेज को अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा था। कुछ ही दिनों में अहमदाबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और जनवरी 1974 तक गुजरात विश्वविद्यालय के छात्र भी आंदोलन पर उतर आए। राज्यभर के छात्र संगठनों ने तीन दिन की हड़ताल का आह्वान किया। धीरे-धीरे आंदोलन में मध्य-वर्ग भी शामिल हो गया, जो चिमनभाई पटेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले ही परेशान था। जल्द ही विभिन्न स्थानीय आंदोलन एकजुट होकर नवनिर्माण समिति के बैनर तले आ गए। समिति ने आंदोलन का दायरा बढ़ाते हुए व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग उठाई। आखिर में मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई और नए चुनाव कराए गए। कांग्रेस (ओ) के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई जैसे विपक्षी नेताओं ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया था। संघ की छात्र इकाई एबीवीपी की भी इसमें भागीदारी थी। वास्तव में, इस आंदोलन ने राज्य में जनसंघ (भाजपा का पूर्ववर्ती स्वरूप) के उभार का पथ प्रशस्त किया था। पहले वह गैर-कांग्रेसी गठबंधनों का हिस्सा बना और अंततः 1995 में भाजपा ने वहां अपने दम पर सरकार बनाई, जिसके बाद से वह आज तक सत्ता से बाहर नहीं हुई है। 1974 में ही जेपी गुजरात आए थे। वहां के आंदोलन से प्रेरित होकर वे बिहार लौटे और कांग्रेस सरकार के खिलाफ इसी तरह का आंदोलन खड़ा किया। इसमें लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे युवा छात्र नेता भी शामिल हुए, जिन्होंने आगे चलकर कई दशकों तक राज्य की राजनीति पर प्रभुत्व कायम रखा। अंतत: मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की सरकार भी सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि यह आंदोलन बिहार और गुजरात की सीमाओं से निकलकर सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध का रूप ले बैठा। जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया। जब कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया और बाद में लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी उससे जुड़ गए, तब ऐसा लग रहा था कि यह आंदोलन धीरे-धीरे बिना किसी खास प्रभाव के समाप्त हो जाएगा। बहुत कम लोगों ने अनुमान लगाया था कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च में दिल्ली की सड़कों पर इतनी बड़ी संख्या में लोग उतरेंगे। लेकिन तब से इन विरोध प्रदर्शनों में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि कई अन्य वर्गों के लोग भी शामिल हो चुके हैं। इनमें ऐसे पैरेंट्स भी हैं, जिन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है; ऐसे स्कूली छात्र हैं जो उच्च शिक्षा के अपने सपनों को लेकर चिंतित हैं; ऐसे वरिष्ठ नागरिक हैं जो युवाओं का उत्साहवर्धन करना चाहते हैं; ऑटो-रिक्शा चालक, बेरोजगार युवा और विभिन्न आयु वर्गों तथा सामाजिक तबकों के अनेक लोग भी इसमें शामिल हैं। ये विरोध प्रदर्शन अभी शुरुआती दौर में ही हैं। इन्हें अभी एक स्पष्ट और संगठित आंदोलन का स्वरूप लेना बाकी है। इस आंदोलन को अभी अपना ‘जेपी’ भी नहीं मिला है। यही स्थिति सरकार को अवसर देती है कि इतिहास के खुद को दोहराने से पहले वह इन विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित कर सके। अतीत से अगर कोई सबक लिया जा सकता है तो वो यही है कि सड़कों पर उतरे लोगों के आक्रोश की अनदेखी करना राजनीतिक समझदारी नहीं है। 1974 में जेपी गुजरात आए थे। वहां के नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरित होकर वे बिहार लौटे और कांग्रेस सरकार के खिलाफ इसी तरह का आंदोलन खड़ा किया। इसमें लालू-नीतीश जैसे छात्र नेता भी शामिल हुए, जिन्होंने आगे चलकर राज्य की राजनीति पर प्रभुत्व जमाया।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

标签 :

留下回复

您的电子邮件地址不会被公开。 必填字段标有 *

最新消息

关于我们

Socialblize是您值得信赖的目的地,提供来自印度和世界各地的最新新闻、热门故事和富有洞察力的更新。我们致力于提供快速、准确和公正的新闻,让您每天都能及时了解情况。

联系我们: info@socialblize.com

联系方式: +91-7976784661

Socialblize @2026. 版权所有。