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डॉ. राजीव ओबेरॉय का कॉलम:कई देशों के उदाहरण हमें बताते हैं कि तरक्की के सच्चे पैमाने क्या हैं

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इतिहास के अनेक अनुभव और उदाहरण हमें सिखाते हैं कि तरक्की की माप महज आंकड़ों से नहीं मिल सकती। यकीनन, आर्थिक वृद्धि का आकलन जीडीपी, बुनियादी ढांचे, निर्यात तथा तकनीकी प्रगति जैसे इंडिकेटर्स से किया जाता है। लेकिन ये किसी राष्ट्र की प्रगति का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं कर सकते। किसी देश की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके साथ-साथ राजनीतिक संस्थाएं, कानूनी-व्यवस्था, सामाजिक मान्यताएं, शिक्षा तथा सांस्कृतिक मूल्य भी समान रूप से विकसित हो रहे हैं या नहीं। जब ये सभी संतुलित रूप से आगे बढ़ते हैं, तब समाज परिवर्तन को अधिक सहजता और स्थिरता से आत्मसात करता है। इसके विपरीत, जब इनके बीच असंतुलन उत्पन्न होता है, तब सामाजिक और राजनीतिक तनाव उभरने लगते हैं। इंग्लैंड इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। मैग्ना कार्टा से लेकर ग्लोरियस रिवोल्यूशन और औद्योगिक क्रांति तक- वहां संवैधानिक व्यवस्था, वित्तीय बाजार, संसदीय संस्थाएं तथा व्यापारिक विस्तार कई शताब्दियों में क्रमशः विकसित हुए। आर्थिक प्रगति के साथ-साथ कानून के राज, अनुबंधों के क्रियान्वयन तथा प्रतिनिधिक संस्थाओं को भी निरंतर सुदृढ़ किया गया। जापान का अनुभव भिन्न होते हुए भी इतना ही शिक्षाप्रद है। मेइजी पुनर्स्थापन के दौरान उसने तीव्र आधुनिकीकरण किया और उद्योग, शिक्षा, टेक्नोलॉजी में बड़े निवेश किए। साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण तत्वों को भी सुरक्षित रखा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में औद्योगिक नीति, सामाजिक अनुशासन, उत्कृष्ट शिक्षा और संस्थागत स्थिरता का समन्वय किया गया। उधर अमेरिका ने यकीनन असाधारण आर्थिक विस्तार किया है, किंतु उसके अनेक गहरे सामाजिक परिवर्तन कई पीढ़ियों में विकसित हुए। लोकतांत्रिक संस्थाएं, सार्वजनिक विमर्श तथा संवैधानिक प्रक्रियाएं ऐसे माध्यम बने, जिनके द्वारा समाज ने समय के साथ बड़े बदलावों को स्वीकारा। ईरान में शाह के शासनकाल के दौरान तीव्र आधुनिकीकरण ने आर्थिक विकास और आधारभूत संरचना में उल्लेखनीय प्रगति की, किन्तु सामाजिक एवं सांस्कृतिक असंतुलन ने अंततः 1979 की क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया। लैटिन अमेरिका के कई देशों तथा वेनेजुएला के अनुभव भी यह दर्शाते हैं कि कमजोर संस्थाएं आर्थिक उपलब्धियों को टिकाऊ नहीं बना पातीं। अफ्रीका में बोत्सवाना ने मजबूत संस्थाओं और विवेकपूर्ण संसाधन-प्रबंधन के माध्यम से स्थिरता प्राप्त की, जबकि कमजोर शासन वाले देशों में विकास लंबे समय तक टिक नहीं पाया। ये उदाहरण किसी सार्वभौमिक नियम की स्थापना नहीं करते, लेकिन वे एक समान प्रवृत्ति अवश्य दर्शाते हैं। यह कि स्थायी समृद्धि आर्थिक नीति, संस्थाओं, कानूनों, शिक्षा, सामाजिक विश्वास तथा सांस्कृतिक अनुकूलन के संतुलित समन्वय पर आधारित होती है।
नीति-निर्माताओं के लिए यह महत्वपूर्ण संदेश है कि बुनियादी ढांचा, निवेश और टेक्नोलॉजी तभी अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं, जब उनके साथ पारदर्शी शासन, सक्षम संस्थाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और जनता का विश्वास भी विकसित हो। राष्ट्रों का इतिहास अंततः यह शिक्षा देता है कि समृद्धि केवल आर्थिक वृद्धि की गति से ही तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि संस्थाएं, संस्कृति, कानून और समाज कितने सामंजस्यपूर्ण ढंग से विकसित होते हैं। प्रगति का वास्तविक माप केवल बढ़ती आय नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक रूप से विकसित होने की क्षमता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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