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एन. रघुरामन का कॉलम:क्या भारतीय पैरेंटिंग किसी भी पश्चिमी शैली से अधिक बेहतर हो सकती है?

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अमेरिका में 4 से 8 साल की उम्र के बच्चों पर साल भर तक चले एक लंबे अध्ययन में पाया गया कि जब श्वेत बच्चे टीवी प्रोग्राम्स में अलग-अलग नस्लों के लोगों को साथ देखते हैं तो इससे उनके मन में किसी के प्रति भेदभाव विकसित नहीं होता। इस सोमवार को जर्नल ऑफ अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट्स में प्रकाशित एक न्यूज रिपोर्ट बताती है कि जिन टीवी प्रोग्राम्स में क्लासिज्म दिखता है, यानी मुख्य किरदार शाही घरानों से होते हैं और सहायक किरदारों को उनसे कम अमीर या कम समझदार दिखाया जाता है तो इससे बच्चों में भेदभाव विकसित हो सकता है। इस खबर ने मुझे बचपन याद दिला दिया, जब हमारे पैरेंट्स अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं की ऐसी कहानियां सुनाते थे। इन कहानियों में वही कालजयी सीख होती थीं, जो आज आधुनिक रिसर्च में भी बताई जाती हैं। भेदभाव मिटाने वाली कुछ कहानियां यहां पेश हैं।
बड़े होकर श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बने, जबकि सांदीपनि ऋषि के आश्रम में उनके साथ ही पढ़ने वाले सुदामा गरीबी में जीवन बिताते थे। एक दिन बहुत संकोच के साथ सुदामा कृष्ण से मिलने पहुंचे और उनके पास केवल चिवड़े की पोटली थी। कृष्ण ने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया, गले लगाया और उन्हें अति-सम्मानित अतिथि का दर्जा दिया। सुदामा को शर्मिंदा किए बिना कृष्ण ने चुपचाप मित्र का जीवन बदल दिया। हमने सीखा : मित्रता सम्पत्ति से बड़ी होती है। वृद्ध आदिवासी महिला शबरी वर्षों तक भगवान राम की प्रतीक्षा करती रहीं। राम के आने की उम्मीद में वह रोज जंगल में रास्ता साफ करती थीं। जब राम आए तो उन्होंने प्रेम से हर बेर को पहले चखकर देखा, ताकि सबसे मीठे फल ही उन्हें दे सकें। राम ने उन्हें खुशी-खुशी स्वीकार किया, क्योंकि उनके लिए वो प्रेम किसी भी शाही भोजन से अधिक मूल्यवान था। हमने सीखा : प्रेम की कोई मर्यादा नहीं होती। याद करिए, हस्तिनापुर में दुर्योधन के भव्य भोज के निमंत्रण के बावजूद कृष्ण विदुर के साधारण घर में गए। वहां विदुर की पत्नी इतनी भावविह्वल हुईं कि उन्होंने फलों की जगह केले के छिलके ही परोस दिए। कृष्ण मुस्कुराए और उन्हें भी स्वीकार किया, क्योंकि वे सच्चे प्रेम से परोसे गए थे। हमने सीखा : प्रेम से भरा घर महल से अधिक समृद्ध होता है। सत्यकाम ऋषि गौतम के गुरुकुल में पढ़ना चाहते थे। जब सत्यकाम से उनके परिवार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ईमानदारी से कहा कि उनकी मां को नहीं पता कि उनके पिता कौन थे। उनकी सत्यवादिता से प्रभावित ऋषि ने कहा कि इतनी ईमानदारी भरे शब्द कोई श्रेष्ठ व्यक्ति ही बोल सकता है और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। हमने सीखा : ईमानदारी ही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। संत रविदास जूते बनाकर आजीविका चलाते थे, जिसे कई लोग छोटा काम मानते थे। लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता, विनम्रता और भक्ति ने उन्हें भारत के महान संतों में से एक बनाया। राजा, रानी और विद्वान उनसे मार्गदर्शन लेते थे, क्योंकि वे संत के चरित्र का सम्मान करते थे, पेशे का नहीं। हमने सीखा : हर पेशा सम्मान के योग्य है। गुजरात के प्रिय संत-कवि नरसी मेहता ने भगवान और मानवता के प्रति समर्पित एक सरल जीवन जिया। उनका प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन तो’ सिखाता है कि श्रेष्ठ वही है, जो दूसरे का दु:ख समझे और बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा किए उसकी मदद करे। उनके जीवन ने पीढ़ियों को हर इंसान के प्रति करुणा रखना सिखाया। हमने सीखा : दूसरे का दर्द महसूस करिए। भगवान विट्ठल के समर्पित भक्त होने के बावजूद संत चोखामेला को भेदभाव झेलना पड़ा और सामाजिक परंपराओं के कारण उन्हें अकसर मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता था। फिर भी उन्होंने आस्था नहीं छोड़ी। उनके भक्ति गीत इतने प्रभावशाली बने कि आज भी पंढरपुर वारी के लाखों श्रद्धालु उन्हें गाते हैं। हमने सीखा : भक्ति की कोई जाति नहीं होती। राजा रंतिदेव की कहानी बताती है कि कई दिनों भूखे रहने के बाद भी उन्होंने अपना भोजन दूसरों को दिया। उनका मानना था कि जरूरतमंदों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। हमने सीखा : आपके पास थोड़ा हो, तब भी बांटिए और दया का कोई दर्जा नहीं होता। फंडा यह है कि यदि हम बच्चों को सोने से पहले यह कहानियां वापस सुनाने लगें तो शर्तिया ही हम हमेशा दुनिया के सबसे अच्छे पैरेंट्स बने रहेंगे।

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