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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चों को विज्ञान की मदद से हमारा परम्परागत ज्ञान समझा सकते हैं

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‘बाल तेजी से कैसे बढ़ाएं?’ और ‘मेरे बाल क्यों झड़ रहे हैं?’ ये गूगल पर खोजे जाने वाले हेयर-केयर से जुड़े शीर्ष दस प्रश्नों में शामिल हैं। दुनिया भर में लाखों लोग ‘हेयर ग्रोथ’ शब्द का इस्तेमाल करके सर्च करते हैं, भले ही उनके प्रश्न अलग-अलग हों। पिछले मंगलवार को कपिवा के संस्थापक और सीईओ अमीव शर्मा के साथ बातचीत के दौरान जब मैंने उनके साथ यह सर्च-संबंधी जानकारी साझा की, तो उन्होंने ऐसी बात कही जिसने मुझे चौंका दिया। उन्होंने कहा, उपभोक्ताओं की इस वैश्विक आवश्यकता ने न्यूट्राफोल को यूनिलीवर के वेलबीइंग बिजनेस का दूसरा सबसे बड़ा ब्रांड बना दिया है। और वे आयुर्वेद के ज्ञान से भरपूर कमाई कर रहे हैं, क्योंकि इस उत्पाद का मूल घटक शतावरी है। हमारी बातचीत 45 मिनट से अधिक समय तक चली। अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल जीवन की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि बैंक-बैलेंस को भी बढ़ाने के लिए न केवल आयुर्वेद, बल्कि हमारे उस प्राचीन ज्ञान को भी समझना आवश्यक है, जिसका आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय होना चाहिए। इस बातचीत की याद मुझे इस शनिवार को आई, जब ऑस्ट्रेलिया से आए मेरे एक मित्र के परिवार के दो बच्चों ने रविवार को बाहर जाकर भोजन करने की योजना बनाई और मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे मुझे इसमें शामिल न करें। मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी कि उन्होंने यह पूछने के बजाय कि आप उपवास क्यों रखते हैं या इसके पीछे कौन-सा विज्ञान है, यह पूछा कि कई पीढ़ियां सैकड़ों वर्षों तक इस परंपरा का पालन क्यों करती रही हैं? कई बार ऐसा प्रश्न किसी नई वैज्ञानिक चर्चा की शुरुआत बन जाता है। अपने विश्वास और आचरण के समर्थन में मैंने जापानी सेल-बायोलॉजिस्ट योशिनोरी ओसुमी के शोध का उल्लेख किया। उन्हें ऑटोफैजी के मैकेनिज्म की खोज के लिए वर्ष 2016 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ऑटोफैजी वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोशिकाएं क्षतिग्रस्त या अनावश्यक घटकों को तोड़कर उनको रीसाइकिल करती हैं। उन्होंने अपने शोध के लिए एकादशी का अध्ययन नहीं किया था और न ही उन्होंने यह सिद्ध किया था कि उपवास बीमारियों का इलाज करने में सक्षम है। हालांकि उन्होंने एक उल्लेखनीय तथ्य सामने रखा कि जब शरीर को कुछ समय के लिए पोषक तत्वों की कमी का सामना करना पड़ता है, तो कोशिकाएं अपनी आंतरिक रीसाइकलिंग प्रणाली को सक्रिय कर देती हैं, जो सेलुलर हेल्थ को बनाए रखने में मदद करती है।
हमारे पूर्वजों के पास न माइक्रोस्कोप थे, न जेनेटिक सीक्वेंसिंग की तकनीक। लेकिन उनके पास सदियों के अनुभव और अवलोकन की विरासत थी। उन्होंने देखा कि अल्प मात्रा में संयमपूर्वक भोजन हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, मन को अधिक एकाग्र करता है और आत्म-अनुशासन को प्रोत्साहित करता है। आयुर्वेद के अनेक ग्रंथ लंबे समय से ‘लंघन’- अर्थात पाचन तंत्र पर भार कम करने की प्रक्रिया को शरीर में संतुलन बहाल करने का एक उपाय बताते आए हैं। आधुनिक जीवनशैली अकसर इसके विपरीत दिशा में आगे बढ़ती है। हम लगातार कुछ न कुछ खाते रहते हैं, देर रात को भोजन करते हैं और शायद ही कभी अपने पाचन-तंत्र को जरूरी आराम देते हैं। परिणामस्वरूप शरीर अपने रखरखाव संबंधी अनेक कार्यों को पूरा करने के बजाय लगातार भोजन को पचाने में लगा रहता है। यही कारण है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग आज पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गई है। लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए आस्था के आधार पर एकादशी या अन्य निर्धारित दिनों में समय-समय पर उपवास रखने की सुव्यवस्थित परंपरा सदियों से मौजूद रही है। जब भी शोधकर्ता नियंत्रित-उपवास का कोई नया लाभ हमारे सामने रखते हैं, हमें याद हो आता है कि भारत की प्राचीन परम्पराएं अकसर प्रकृति और मानव-शरीर के सूक्ष्म अवलोकन पर आधारित थीं। जीवविज्ञान की पुस्तकों में सेलुलर-रीसाइकिलिंग की व्याख्या आने से बहुत पहले ही हमारे पूर्वजों ने समय-समय पर उपवास को दैनिक जीवन का हिस्सा बना लिया था- चिकित्सीय उपचार के रूप में नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण जीवन-पद्धति के रूप में। हमारे पुरखों ने कभी सेलुलर-रीसाइकिलिंग, मेटाबॉलिक स्विचिंग या ऑटोफैजी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने शोध-पत्र प्रकाशित नहीं किए। उन्होंने केवल पीढ़ियों तक प्रकृति, ऋतुओं, मानव-व्यवहार और स्वास्थ्य का अवलोकन किया। उनका ज्ञान प्रयोगशाला के उपकरणों नहीं, सदियों में संचित अनुभव से विकसित हुआ था। इसीलिए परम्परा और विज्ञान में टकराव का रिश्ता होना जरूरी नहीं है। परम्परा अकसर एक परिकल्पना प्रस्तुत करती है, जबकि विज्ञान उसकी जांच करता है। एक अनुभव को संरक्षित करता है, दूसरा उसकी व्याख्या करता है। फंडा यह है कि अपनी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाइए- न उनसे आंख मूंदकर उस पर विश्वास करने को कहिए और न ही उसे नकारने को, बल्कि उन्हें विज्ञान की मदद से सम्मान और जिज्ञासा के साथ उसे एक्सप्लोर करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

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