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अमिताभ कांत का कॉलम:एआई के क्षेत्र में ये 4 फैक्टर हमें कामयाबी दिला सकते हैं

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आप मानें या न मानें, लेकिन हम एक सभ्यतागत बदलाव से गुजर रहे हैं। पिछली बार इस पैमाने का बदलाव औद्योगिक क्रांति में हुआ था, जिसे पूरा होने में दो सदियां लगी थीं। लेकिन ये वाला दो दशकों में पूरा हो जाएगा। स्टैनफोर्ड एआई इंडेक्स के अनुसार जीपीटी-3.5 स्तर के किसी मॉडल से प्रश्न पूछने की लागत 2022 में प्रति मिलियन टोकन 20 डॉलर थी, जो 2024 तक घटकर 0.07 डॉलर रह गई। सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग क्षमता का व्यावहारिक मूल्यांकन करने वाले ‘एसडब्ल्यूई-बेंच’ पर एआई सिस्टमों ने अपना प्रदर्शन सुधारा है। 2023 में ये सिस्टम केवल 4.4% समस्याएं हल कर पा रहे थे, 2024 में यह आंकड़ा 71.7% तक पहुंच गया। मैकिन्से के सर्वे में पाया गया कि 2025 तक 88% संगठन कम-से-कम एक व्यावसायिक कार्य में एआई का उपयोग शुरू कर चुके थे, जबकि दो वर्ष पहले यह आंकड़ा 55% था। जनरेटिव एआई भी तीन वर्षों में 53% आबादी तक पहुंच गया है। इंटेलिजेंस आज पहले से कहीं सस्ती, अधिक उपलब्ध और व्यापक रूप से इस्तेमाल योग्य बन चुकी है। इसे देखते हुए हर सरकार, कंपनी और संस्थान को अपनी धारणाओं पर दोबारा सोचना चाहिए। भारत के लिए भी ऐसे में आज असली सवाल है कि क्या हम इस बदलाव से मूल्य हासिल कर पाएंगे? भारत वैश्विक एआई सिस्टमों को डिजिटल डेटा, भाषाई विविधता और मानवीय संदर्भ उपलब्ध कराता है, लेकिन अत्याधुनिक मॉडल किन्हीं और देशों में ही केंद्रित हैं। स्टैनफोर्ड के अनुसार, 2024 में अग्रणी एआई मॉडलों में लगभग 90% अमेरिका से आए थे। दूसरे शब्दों में, भारत भविष्य की इंटेजिलेंस प्रणाली को प्रशिक्षित करने में मदद कर रहा है, लेकिन स्वयं की कम्प्यूटिंग क्षमता, डेटा आर्किटेक्चर और मॉडल निर्माण क्षमता के बगैर इस मूल्य का बड़ा हिस्सा विदेशों में चला जाता है। लेकिन भारत की शुरुआत कमजोर नहीं है। वास्तव में उसके पास चार ऐसे एडवांटेज हैं, जिनकी बराबरी बहुत कम देश कर सकते हैं। यह हैं- प्रतिभा, नियमों का खुलापन, इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी। प्रतिभा की बात करें तो एआई-कुशल आबादी के मामले में भारत का पहला स्थान है। हमारे यहां एआई कौशल का स्तर वैश्विक औसत से 2.8 गुना अधिक है, जो अमेरिका और जर्मनी से भी आगे है। पिछले दशक में भारत में एआई-प्रतिभा तेजी से बढ़ी है। भारत अब केवल इंजीनियर निर्यात करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि घर में ही इस प्रतिभा का इस्तेमाल भी कर रहा है। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर, स्टार्टअप और बड़ी कंपनियां देश में एआई टीमें बना रही हैं। यह संकेत है कि भारत एआई युग का बैक-ऑफिस नहीं, उसके प्रमुख संचालन केंद्रों में से एक बन रहा है। दूसरे, कई देश जहां एआई पर पहले से कड़े नियंत्रण लागू करने की तरफ बढ़ रहे हैं, वहीं इस दिशा में भारत का नजरिया शायद दुनिया में सबसे दूरदर्शी है। हमने हल्के-फुल्के नियमनों को चुना है। आरबीआई का रेगुलेटरी सैंडबॉक्स, इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विस सेंटर अथॉरिटी (आईएफएससीए) इनोवेशन फ्रैमवर्क और इंडिया-एआई मिशन की सिद्धांत-आधारित गाइडलाइन- ये सभी एक ही उद्देश्य के लिए डिजाइन किए गए हैं कि पहले बनाओ, फिर जो सामने आए उसे विनियमित करो। तेजी से बदलते क्षेत्रों में अत्यधिक कठोर नियम तकनीक के इस्तेमाल में देरी कर सकते हैं, लागू करने का खर्च बढ़ा सकते हैं और छोटी कंपनियों में प्रयोगों को हतोत्साहित कर सकते हैं। इसलिए व्यापक प्रतिबंध लगाने से पहले इनोवेशन को विकसित होने देने की भारत की नीति हमें प्रतिस्पर्धी बढ़त दिला सकती है। तीसरा लाभ है बुनियादी ढांचा। भारत डेटा सेंटरों, सेमीकंडक्टरों, क्लाउड कैपेसिटी और हाई-परफॉर्मेंस कम्प्यूटिंग के रूप में एआई अर्थव्यवस्था की आधारभूत संरचना में बड़े विस्तार का साक्षी बन रहा है। सिर्फ डेटा सेंटर क्षेत्र में ही 70 अरब डॉलर का निवेश चल रहा है और 90 अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की घोषणा हो चुकी है। विशाखापट्‌टनम में गूगल का 15 अरब डॉलर का एआई हब, क्लाउड और एआई में माइक्रोसॉफ्ट की 17.5 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता, जामनगर में रिलायंस की मल्टी-गीगावॉट डेटा सेंटर की योजनाएं बताती हैं कि वैश्विक पूंजी भारत के स्थान को नए सिरे से परिभाषित करने में जुट गई है। डेटा सेंटरों को चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली चाहिए। 2025-26 में देश ने रिकॉर्ड 55.3 गीगावॉट अतिरिक्त गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल की। बीते दशक में हमने सौर ऊर्जा शुल्कों को भी कम किया है। इससे भारत ऐसी जगह के तौर पर उभरा है, जहां एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को क्लीन एनर्जी के जरिए चलाया जा सकता है। हमारे यहां एआई कौशल का स्तर वैश्विक औसत से 2.8 गुना अधिक है, जो अमेरिका और जर्मनी से भी आगे है। पिछले दशक में भारत में एआई-प्रतिभा तेजी से बढ़ी है। भारत घर में ही इस प्रतिभा का इस्तेमाल करने भी लगा है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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