भगवान की कृपा सबके लिए समान रूप से बरसती है। हमें दो कारणों से लाभ नहीं मिल पाता- भरोसे की कमी और मूर्खता की अधिकता। ईश्वर भरोसे का दूसरा नाम है, लेकिन हमारी मूर्खता हमें भरोसे से दूर कर देती है। गरुड़ जी को काकभुशुंडि जी ने कहा- राम कृपा आपनि जड़ताई, कहउं खगेस सुनहु मन लाई। गरुड़ जी, राम जी की कृपा और अपनी मूर्खता की बात कहता हूं, मन लगाकर सुनिए। परमात्मा संबंधी जो भी क्रिया हो, उसमें मन लगना चाहिए। एकाग्रचित्त होना चाहिए। अगर हम परमात्मा के प्रति भरोसा रखें तो परमात्मा ने अपनी कृपा करने के लिए एक से एक तरीके निकाले हैं। हम पानी किसी बर्तन में पीते हैं। ईश्वर ने इतने महत्वपूर्ण पात्र को कलश बना दिया, जिसकी हम पूजा करते हैं और कलश में हम परमात्मा का वास मानते हैं। यह परमात्मा की कृपा का अक्षय पात्र बन जाता है। इसीलिए आज शोभा यात्राओं में लोग सिर पर कलश लेकर निकलते हैं। इसलिए कोई भी ऐसी मूर्खता न करें, जिससे हमारा भरोसा भगवान से उठ जाए।




