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रश्मि बंसल का कॉलम:फॉलोअर होना बुरा नहीं, पर अपनी राह चले लीडर है वही

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सुबह-सवेरे एक महिला एयरपोर्ट में नाइट सूट पहने घूम रही थी। मैंने सोचा, बेचारी लेट हो गई, इसलिए जल्दी में घर से निकल पड़ी। कपड़े बदलने का टाइम नहीं मिला। लेकिन फिर मैंने देखा कि एक नहीं, अनेक महिलाएं नाइट सूट में घूम रही हैं। तो फिर मेरी बत्ती चमकी- यह कोई नया फैशन है? ‘हट पगली’, मेरी सहेली ने कहा, ‘इसको नाइट सूट नहीं, ‘कॉर्ड सूट’ बोलते हैं। कहते हैं ना अंग्रेजी में को-ऑर्डिनेटेड यानी कि एक जैसा, तो शॉर्ट में को-ऑर्ड और देसी अंदाज में लोग उसे ‘कॉर्ड सूट’ कहने लगे।’
बस, वही नाम चिपक गया और अब महिलाएं इसकी दीवानी हैं। ‘मगर क्यों’, मैंने सहेली से पूछा? ‘जो महिला टेलर को दस हिदायतें देती है कि ब्लाउज की फिटिंग परफेक्ट चाहिए, अब वो इतने लूज कपड़ों में घूम रही है?’ सहेली ने कहा, ‘हां जी, यही तो कॉर्ड सूट की खासियत है। जैसे आप घर की ड्रेस में फील करते हो, वैसे ही बाहर भी फील कर सकते हो, कॉर्ड सूट पहन कर।’ है तो यह ग्लोबल ट्रेंड, मगर देशवासियों के लिए यह एक जाना-पहचाना-सा लुक भी है।
आपको वो दिन याद होंगे जब एक घर में 4-6 बच्चे होना आम बात थी, तब भी तो कॉर्ड सेट ही चलते थे। मतलब एक घर के तीन भाई एक ही थान से कपड़ा खरीद कर सेम-टु-सेम शर्ट बनवाते थे। अब इसके दो कारण हो सकते हैं। या तो सस्ता पड़ता होगा, या मां-बाप की सोच थी कि एक-सा पहनेंगे, तो बच्चों में लड़ाई कम होगी। वैसे पुराने टाइम में फोटो सिर्फ खास मौकों पर ली जाती थी, और उन दुर्लभ फोटो में बच्चे जमीन पर आलथी-पालथी मारकर बैठे हुए, एक जैसी ड्रेस में बड़े क्यूट लगते हैं। फिर जैसे-जैसे ‘हम दो, हमारे दो’ का दौर चला, और फिर ‘हम दो, हमारा एक’ हुआ, बच्चे हमारे हाथ से निकल गए। चार साल की उम्र के बाद मां-बाप की चॉइस की हर चीज रिजेक्ट हो जाती है। यहां तक कि खुद मां-बाप भी। कोई बात नहीं सिमरन, जी ले अपनी जिंदगी- खरीद ले अपनी पसंद के ब्रांडेड कपड़े! लेकिन अब कपड़े के थान कैसे बिकेंगे? चलो एक नया आइटम निकालते हैं- कॉर्ड सूट। आइडिया अच्छा, मगर नाक-नक्श तो नाइट सूट जैसा है, इसे एक अलग पहचान देनी होगी। जैसे घर का दही दही होता है और दुकान का दही ‘योगर्ट’, इसी तरह घर का पायजामा जब एटिट्यूड दिखाते हुए निकल पड़ा सैर पर, वो कॉर्ड सूट कहलाता है। ट्रेंड कैसे बनता है?
पहले कुछ सेलेब्रिटीज की फोटो छपती है, किसी नई पोशाक में। फिर वही चीज वायरस की तरह हर ऑनलाइन दुकान में बिकने लगती है। जब से अनुष्का शर्मा और कियारा आडवाणी ने हल्के गुलाबी रंग के लहंगे में शादी की, देश भर में दुल्हनें पेस्टल शेड के लहंगे में फेरे लेने लगीं। दादी ने मन ही मन सोचा- सफेद-सफेद कपड़ों में शादी हो रही है? हे भगवान, हमारे जमाने में तो अपशगुन मानते थे। लेकिन, बच्चों की मर्जी, हम कौन होते हैं रोकने वाले?
वैसे भी लहंगा किसी भी रंग का हो, शादी के शोर-शराबे के बाद लड़का-लड़की शादी निभा लें- यही भगवान से प्रार्थना है। खैर, सोशल मीडिया के जमाने में वायरल ट्रेंड छींक से नहीं, रील से फैलती है। हर कोई अपनी फोटोज डाल रहा है बाली से, तो हम क्यों जाएं शिमला-मनाली? और छुट्टियां नाना-नानी के घर में बिताना? तौबा, स्कूल में हमारे बच्चे की नाक ही कट जाएगी। तो बस, भेड़-चाल में शामिल होने को हम ‘ट्रेंड’ कहते हैं। सब लोग माचा पी रहे हैं, हम भी पीएंगे। जिस शान से वो जी रहे हैं, हम भी जीएंगे। परदे के पीछे क्या है पता नहीं। बस ड्रामा हो रहा है, हम मानते नहीं। क्योंकि अपने दिल से, अपने दिमाग से, हम जीना जानते नहीं। आखिर में यही कहूंगी कि फॉलोअर होना बुरा नहीं, मगर जो अपनी राह पर चले, लीडर है वही। फैशन कपड़ों का हो या जीने का, आंखें मूंदकर शामिल न हों। अपने ही अंदाज में, सुर और साज से, एक मुकम्मल जहां हासिल करो। भेड़-चाल में शामिल होने को हम ‘ट्रेंड’ कहते हैं। सब लोग जो खा-पी रहे हैं, हम भी खाएंगे-पीएंगे। जिस शान से वो जी रहे हैं, हम भी जीएंगे। परदे के पीछे क्या है पता नहीं। क्योंकि अपने दिल से, अपने दिमाग से, हम जीना जानते नहीं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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