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सैयद अता हसनैन का कॉलम:पश्चिमी सीमा पर अनवरत संघर्ष में उलझ चुका है पाक

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अगस्त 2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान का नाटकीय कब्जा हुआ तो लगा कि पाकिस्तान अपने भू-राजनीतिक प्रयासों में सफल हो गया। पाकिस्तान ने चार दशकों से अधिक समय तक राजनीतिक पूंजी, खुफिया संसाधन और सैन्य प्रयास इस बात के लिए खर्च किए थे, ताकि अफगानिस्तान में रणनीतिक बढ़त हासिल कर सके। पर्यवेक्षकों को लग रहा था कि पाकिस्तान अब अफगानिस्तान में पकड़ मजबूत करेगा, पश्चिमी सरहद सुरक्षित करेगा और रणनीतिक तौर पर अपना ध्यान भारत की ओर फिर से केंद्रित करेगा। लेकिन पांच साल से भी कम समय में घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। आज पाकिस्तान को अफगानिस्तान में एक शत्रुतापूर्ण सरकार, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की अगुवाई में उग्रवादी हिंसा और सीमा पर बिगड़ती सुरक्षा-व्यवस्था झेलनी पड़ रही है। सवाल यह है कि सबसे बड़ी भू-राजनीतिक सफलता हासिल करने के तत्काल बाद ही पाकिस्तान ने रणनीतिक नियंत्रण कैसे खो दिया? इसकी जड़ में एक सदी से चला आ रहा उस डूरंड रेखा से जुड़ा विवाद है, जिसे ब्रिटिश राज के दौरान 1893 में निर्धारित किया गया था। पश्तून जनजातीय क्षेत्रों को विभाजित करने वाली यह विवादित सीमा समान जातीय पहचान वाले समुदायों को भी बांटती है। अफगान सरकारों ने भी इस सीमा को स्वीकार नहीं किया। वास्तव में 1947 में अफगानिस्तान ही इकलौता देश था, जिसने इस मुद्दे पर पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिए जाने का विरोध किया था। पाकिस्तान को भरोसा था कि दशकों तक उसने तालिबान को समर्थन दिया है तो इसके चलते उसकी सरकार अंततः डूरंड रेखा को स्वीकार लेगी। लेकिन उसका आकलन गलत साबित हुआ। इस्लामिस्ट होने के बावजूद तालिबान पर पश्तून राष्ट्रवाद का भी प्रभाव है। ऐसे में पाकिस्तानी दावों को स्वीकारना उसकी घरेलू वैधता को गंभीर रूप से कमजोर करता है। दशकों तक तालिबान कमांडरों पर पाकिस्तान की आईएसआई का दबदबा रहा, क्योंकि नाटो के खिलाफ विद्रोह के दौरान वे पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकानों पर निर्भर थे। लेकिन जब कोई उग्रवादी आंदोलन सत्ता हासिल कर ले तो उसकी प्रकृति बदल जाती है। अगस्त 2021 से पहले तालिबान को पाकिस्तान की जरूरत थी, लेकिन इसके बाद स्थिति उलट गई और पाकिस्तान को तालिबान की जरूरत पड़ने लगी। पाकिस्तान इस अहम बदलाव को समझने में विफल रहा। तालिबान के सत्ता हासिल करने के तुरंत बाद पाकिस्तान के खुफिया चीफ की हाई-प्रोफाइल काबुल यात्रा इसी भटके हुए आत्मविश्वास का प्रतीक थी। और यहीं से हालात के आकलन में एक बड़ी भूल की शुरुआत हुई। इस बदलाव का सबसे पहला परिणाम यह रहा कि टीटीपी फिर से सिर उठाने लगा। भले टीटीपी अफगान तालिबान से अलग संगठन है, लेकिन वह तालिबान के साथ अपनी वैचारिक जड़ें, जनजातीय संबंध साझा करता है। सीमापार युद्धक्षेत्रों में दोनों संगठनों के आपसी सहयोग का लंबा इतिहास है। सत्ता में लौटने के बाद अफगान तालिबान ने तेजी से टीटीपी के लिए सुरक्षित ठिकानों का विस्तार किया। वैचारिक एकजुटता के कारण तालिबान सरकार के लिए यह कठिन है कि वह महज पाकिस्तान को संतुष्ट करने के लिए अपने साथी इस्लामिस्ट लड़ाकों पर कार्रवाई करे। पाकिस्तान द्वारा अफगान नीति को डिक्टेट करने की कोशिशों को लेकर भी असंतोष बढ़ा है। पाकिस्तान के सीमापार हमलों ने अविश्वास को और गहरा किया, जिससे टीटीपी की पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों के लिए अनुकूल माहौल बन गया। जैसे-जैसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान के संबंध बिगड़ते गए, भारत ने अपना महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रभाव फिर से हासिल कर लिया है। पाकिस्तान की आतंकवादियों को ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ में श्रेणीबद्ध करने वाली नीति की कलई खुल चुकी है। दशकों तक पाकिस्तान ने उन आतंकी संगठनों को समर्थन दिया है, जो अफगानिस्तान और भारत में उसके रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करते थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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