सवाल– मेरी उम्र 42 साल है। मैं एक MNC में अच्छी जॉब करती हूं और बेंगलुरू में अकेले रहती हूं। एक दिन मेरे बॉस ने मुझसे कहा कि तुम हर काम अकेले ही क्यों करना चाहती हो। तुम टीम की हेल्प क्यों नहीं लेती। ये बात मेरे मन में बैठ गई क्योंकि ये सच है। चाहे पर्सनल लाइफ हो या प्रोफेशनल, मैं कभी किसी की मदद नहीं मांगती। हर काम खुद ही करती हूं। मुझे लगता है कि हेल्प मांगकर मैं खुद को कमजोर साबित करूंगी। इस वजह से कई बार परेशान भी होती हूं। क्या ये सचमुच में कोई मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम है। इंस्टाग्राम पर ढेरों रीलें मेरी फीड में आती हैं, जो कहती हैं कि हेल्प न लेने के पीछे भी कोई ट्रॉमा होता है। मैं क्या करूं? खुद को कैसे बदलूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले यह समझिए कि आत्मनिर्भर होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। अपने फैसले खुद लेना अच्छी बात है। अपने काम खुद करना भी अच्छी बात है। अपनी जिम्मेदारी निभाना भी अच्छी बात है। आत्मनिर्भरता, जिम्मेदारी और समस्या सुलझाने की क्षमता आपकी ताकत है। समस्या तब शुरू होती है, जब– जब आपके मन में यह एक नियम बन जाता है कि— “चाहे जितनी परेशानी हो, मुझे किसी से मदद नहीं मांगनी है।” तो यह समस्या है, जिसे एड्रेस करने की जरूरत है। क्या आप दूसरों की मदद करेंगे? अक्सर ऐसा होता है कि हम दूसरों की मदद करके खुश होते हैं, लेकिन अपने लिए मदद नहीं मांगते। अगर आपका कोई दोस्त आपसे कहे कि— तो क्या आप नाराज होंगे? शायद नहीं बल्कि आपको अच्छा लगेगा कि उसने आप पर भरोसा किया। फिर जब आपको जरूरत होती है, तब आप यही मौका दूसरों को क्यों नहीं देते? इसकी वजह अक्सर हमारी सोच होती है। हमारे मन में कुछ ऐसी मान्यताएं बैठ जाती हैं, जो सच नहीं होतीं, लेकिन हमें सच लगने लगती हैं। क्या मदद मांगते हुए आपके मन में भी ये विचार आते हैं– आइए इन सभी विचारों को थोड़ा डिटेल में समझते हैं– 1. मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती यह सबसे आम सोच है। बहुत से लोग मानते हैं कि मदद मांगना मतलब सामने वाले को परेशान करना। खासकर महिलाओं में यह सोच ज्यादा होती है। उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि सबको संभालो। शिकायत मत करो। किसी को परेशानी मत दो। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है। फिर वे अपनी जरूरतों को भी पीछे रखने लगती हैं। लेकिन जरा सोचिए, अगर आपका दोस्त आपसे मदद मांगे तो क्या आपको लगेगा कि वह बोझ बन रहा है? अगर नहीं तो फिर आप खुद के बारे में ऐसा क्यों सोचती हैं? सच यह है कि स्पष्ट और सीमित मदद मांगना बोझ बनना नहीं है। आप सामने वाले को सिर्फ एक मौका दे रहे हैं। उसके पास हमेशा ‘हां’ और ‘ना’ कहने का अधिकार है। 2. लोग मुझे कमजोर समझेंगे कई लोग अपनी जरूरत छिपाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने मदद मांगी तो लोग सोचेंगे कि वे सक्षम नहीं हैं। लेकिन असल जिंदगी में ऐसा बहुत कम होता है। ऑफिस में जो लोग– उन्हें अक्सर ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है क्योंकि वे गलती छिपाने की बजाय समाधान ढूंढ़ते हैं, जैसेकि इन दो वाक्यों का फर्क देखिए– पहले वाक्य में पूरी जिम्मेदारी दूसरे पर डाल दी गई। दूसरे वाक्य में सिर्फ सहयोग मांगा गया है। यही स्वस्थ मदद मांगना है। 3. सामने वाला मना कर देगा कई बार हम बिना पूछे ही फैसला कर लेते हैं। हमें लगता है कि सामने वाला बहुत व्यस्त होगा या शायद हमारी मदद नहीं करना चाहेगा। इसलिए हम पूछते ही नहीं हैं। लेकिन रिसर्च बताती है कि लोग अक्सर हमारी सोच से ज्यादा मदद करने के लिए तैयार रहते हैं। इसलिए अगर कोई मना भी कर दे तो इसका मतलब यह नहीं कि उसने आपको ठुकरा दिया है। हो सकता है, उसके पास समय न हो। या वह उस समय किसी और काम में व्यस्त हो। ‘ना’ सुनना हमेशा असफलता नहीं होती। क्या इसके पीछे ट्रॉमा हो सकता है? हां, कभी-कभी, लेकिन हर बार नहीं। यही बात समझना सबसे जरूरी है। आजकल सोशल मीडिया पर हर आदत को ट्रॉमा से जोड़ दिया जाता है, जबकि सच तो ये है कि इंसान की आदतें कई वजहों से बनती हैं। इसलिए सिर्फ किसी के मदद न मांगने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसके साथ बचपन में कोई ट्रॉमा हुआ था। क्या पुराने अनुभव भी इसकी वजह हो सकते हैं? हां, ऐसा हो सकता है। लेकिन हर व्यक्ति के साथ ऐसा हो, जरूरी नहीं है। कुछ लोगों के जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं, जो उन्हें धीरे-धीरे यह सिखाते हैं कि “मुझे अपना काम खुद ही करना होगा।” कुछ उदाहरण– ऐसे अनुभवों के बाद कुछ लोग दूसरों पर भरोसा करना कम कर देते हैं। वे सोचने लगते हैं कि सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि किसी पर निर्भर ही मत बनो। लेकिन समय के साथ यही सोच एक आदत बन जाती है। फिर जरूरत होने पर भी वे किसी से कुछ नहीं कहते। इसलिए यहां खुद से एक सवाल पूछिए। सवाल यह नहीं है कि “क्या मुझे कोई ट्रॉमा हुआ था?” ज्यादा जरूरी सवाल यह हैं कि— “मैंने मदद न मांगने की यह आदत कब सीखी?” “क्या यह आदत आज भी मेरे काम आ रही है, या अब मुझे नुकसान पहुंचा रही है?” यही सवाल आपको सही दिशा में लेकर जाएगा। मदद मांगने से डर क्यों लगता है? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 8 सवाल हैं। इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और पिछले छह महीनों को ध्यान में रखते हुए इनके उत्तर तीन तरीकों से दें– जैसेकि पहला सवाल है, “मैं परेशान होने पर भी मदद नहीं मांगती।” अब इसका जवाब तीन तरीकों से हो सकता है– ये सेल्फ एसेसमेंट कोई मेडिकल या साइकोलॉजिकल टेस्ट नहीं है। इससे आपको सिर्फ अपनी आदत और बिहेवियर पैटर्न को समझने में मदद मिलेगी। खुद को कैसे बदलें? यह आदत एक दिन में नहीं बनी। इसलिए एक दिन में बदलेगी भी नहीं। इसके लिए छोटे-छोटे कदम उठाइए। अपने दिमाग को धीरे-धीरे नया अनुभव दीजिए। यही CBT यानी कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी का मूल सिद्धांत है। यहां मैं आपको चार हफ्तों का एक सेल्फ मैनेजमेंट टूल दे रहा हूं। पहला सप्ताह अपने मन की बात पकड़िए जब भी मदद मांगने का मन हो और आप खुद को रोक लें, उस समय एक मिनट का ब्रेक लीजिए और ये चार बातें लिखिए। उदाहरण: स्थिति- कल प्रेजेंटेशन देना है। पहला विचार- अगर बॉस से पूछूंगी तो वे सोचेंगे कि मैं सक्षम नहीं हूं। भावना- डर। फिर खुद से पूछिए- “क्या इसका कोई सबूत है?” हो सकता है जवाब मिले- “मैं तो खुद कई बार कह चुका हूं कि जरूरत पड़े तो पूछ लिया करो।” यहीं से सोच बदलनी शुरू होती है। दूसरा सप्ताह छोटी मदद स्वीकार कीजिए शुरुआत किसी बड़ी बात से मत कीजिए। छोटी-सी मदद मांगिए, जैसेकि– ऐसे छोटे अनुभव दिमाग को सिखाते हैं कि मदद मांगना हमेशा बुरा अनुभव नहीं होता। तीसरा सप्ताह मदद मांगने का सही तरीका सीखिए कई लोग इसलिए भी मदद नहीं मांगते क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता कि कैसे कहें। इसके लिए एक आसान तरीका अपनाइए। आप कहिए- “मैंने अपना काम काफी हद तक पूरा कर लिया है। बस इस हिस्से में आपकी 10 मिनट की मदद चाहिए। अगर अभी समय न हो तो कोई बात नहीं।” इस तरह का अनुरोध तीन बातें बताता है। ऐसी बातचीत रिश्तों को मजबूत बनाती है। चौथा सप्ताह अपने डर की सच्चाई जांचिए हर बार मदद मांगने से पहले लिखिए- कुछ दिनों बाद अपनी डायरी पढ़िए। अक्सर लोग देखते हैं कि उनके ज्यादातर डर सच ही नहीं हुए। प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी अगर मदद न मांगने की आदत की वजह से आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगी है, तो किसी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या मनोचिकित्सक से सलाह लेना अच्छा रहेगा। अंतिम बात आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है, लेकिन हर वक्त अकेले लड़ते रहना जरूरी नहीं है। जिंदगी कोई एकल प्रतियोगिता नहीं है। हम सभी को कभी–न–कभी दूसरों की मदद की जरूरत पड़ती है। याद रखिए– मदद मांगना हार मानना नहीं है। मदद मांगना यह स्वीकार करना है कि हम इंसान हैं, और इंसान रिश्तों और सहयोग से ही आगे बढ़ते हैं। ………………… मेंटल हेल्थ से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ- शादी के बाद नौकरी छोड़ दी: अब सिर्फ एक पत्नी और मां हूं, सबको खुश करने की कोशिश में अपनी खुशी भूल गई, क्या करूं ये समस्या आपकी अकेले की नहीं है। हजारों महिलाएं जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर ये महसूस करती हैं। वे अच्छी मां हैं, जिम्मेदार पत्नी हैं, परिवार की मजबूत आधारशिला हैं, लेकिन जब बात खुद की आती है तो जवाब धुंधला पड़ जाता है। पूरी खबर पढ़िए…



