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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:चुनावों में बेतहाशा खर्च भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है

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चुनाव लड़ना एक महंगा काम है। भारत में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए पार्टियों को दो प्रमुख आवश्यकताएं होती हैं। पहली, अपने उम्मीदवार के चुनाव-प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर धन जुटाना। दूसरी, अपनी सीटें बढ़ाने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों को अपने पक्ष में करना। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पांच राष्ट्रीय और 21 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को दानदाताओं से आधिकारिक रूप से कुल 7,445 करोड़ रुपए मिले थे। यह चुनावी फंडिंग का वैध हिस्सा है। व्यावसायिक कंपनियों और व्यक्तियों के लिए दलों को डोनेट करने की अनुमति देने वाली विवादास्पद इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को फरवरी 2024 में उच्चतम न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। लेकिन अधिकांश दलों ने इसका विकल्प तलाशने के तरीके विकसित कर लिए हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भी आंतरिक रूप से विभाजित तृणमूल कांग्रेस के बैंक खाते में 630 करोड़ से अधिक की राशि शेष होना यह दर्शाता है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान वैध और अवैध, दोनों प्रकार के धन का व्यापक प्रवाह होता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 7,445 करोड़ का आधिकारिक व्यय वास्तविक चुनावी खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) ने अनुमान लगाया है कि चुनाव की कुल लागत 1.35 लाख करोड़ रु. रही थी। यह 2004 के लोकसभा चुनाव में खर्च हुए 15,000 करोड़ की तुलना में 900% अधिक है। यह 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर हुए 1.2 लाख करोड़ रु. के खर्च से भी अधिक है। चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तय की है। प्रत्येक सांसद कानूनी रूप से अधिकतम 95 लाख तक खर्च कर सकता है, जबकि विधायकों के लिए यह सीमा 28 लाख से 40 लाख के बीच है। लेकिन दलों के चुनावी खर्च पर सीमा नहीं है। इन अनुमानों के आधार पर, 2024 के लोकसभा चुनाव में अवैध फंडिंग 1 लाख करोड़ रुपए से कहीं अधिक रही। यह धन कंपनियों, रियल एस्टेट डेवलपर्स और अन्य स्रोतों से आया। ये जिन दलों को धन देते हैं, उनसे भविष्य में लाभ की अपेक्षा भी रखते हैं। यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में विनियमित पब्लिक अफेयर्स कमेटियां (पीएसी) सीनेट और प्रतिनिधि सभा के उम्मीदवारों के चुनाव अभियानों में बड़ी मात्रा में धन लगाती हैं। अमेरिकन इजराइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी (एआईपीएसी) जैसे प्रभावशाली फंडिंग ग्रुप्स किसी उम्मीदवार की चुनावी संभावनाओं को बना या बिगाड़ सकते हैं। एआईपीएसी दशकों से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन और सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं को वित्तीय समर्थन देता रहा है। अंतर केवल पारदर्शिता का है। हालांकि, अमेरिकी व्यवस्था में भी कार्टेल और विशेष हित समूहों का अवैध धन नकद के रूप में उम्मीदवारों तक पहुंचता है। भारत में चुनावों में नकद फंडिंग का अनुपात कहीं अधिक है और यह व्यापक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। यद्यपि केंद्र स्तर पर भ्रष्टाचार यूपीए के फोन-बैंकिंग वाले दौर की तुलना में कम हुआ है, लेकिन राज्य और नगर निकाय स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा है। सरकार इससे अनभिज्ञ नहीं है, लेकिन इसके बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकती। हर स्तर पर चुनावी फंडिंग की आवश्यकता होती है। विधानसभा और नगर निगमों में बहुमत हासिल करने के लिए विपक्षी नेताओं को अपने पक्ष में करना भारी कीमत वसूलता है। लेकिन इस सबसे मतदाताओं के दो प्रमुख वर्गों में असंतोष बढ़ रहा है। पहला, मध्यमवर्गीय करदाता और व्यापारी, जिन्हें लगता है कि उनके साथ अपेक्षित न्याय नहीं हुआ। दूसरा, जेन-जी युवा, जिनका मानना है कि सरकार ने रोजगार सृजन के लिए बहुत कम किया है। ये दोनों वर्ग मुख्यतः सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों पर ही अधिक मुखर हैं। अधिकांश भारतीय इस बढ़ते असंतोष से अप्रभावित हैं। लेकिन सरकार उन्हें हल्के में नहीं ले सकती। राम मंदिर की दानपेटी की चोरी की घटना एक चेतावनी है। भारतीय जनता पार्टी राम मंदिर के मुद्दे पर सत्ता तक पहुंची थी। यदि भ्रष्टाचार का दाग भगवान के घर तक पहुंचता दिखाई देता है, तो भाजपा के किले की नींव कमजोर पड़ सकती है। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी अनेक संकटों का सामना कर चुके हैं- कोविड, टैरिफ, युद्ध आदि। लेकिन भ्रष्टाचार अनेक सिरों वाले राक्षस की तरह है। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले उस पर नियंत्रण पाना मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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