गंदे विचार बुढ़ापे तक नहीं छूटते। यह बात सबसे अच्छे ढंग से वृद्ध ही जानते हैं। क्योंकि इस सब में जो कुछ व्यक्त होता है, वो तो बाहरी अनुशासन के साथ छुपा लिया जाता है। पर जो अव्यक्त है, वो भीतर घट रहा है। शरीर शिथिल हो जाता है पर इंद्रियां अपनी मांग बंद नहीं करतीं। फिर मनुष्य का जीवन तो द्वंद्व से भरा है। हमने युवावस्था में जो जीवन बिताया, उसकी कई बातें वृद्धावस्था में अजीब ढंग से ध्यान में आती हैं। उदाहरण महाभारत का लें। मांस के टुकड़े से सौ देहें बन गईं, जो कौरव हुए। संजय ने सारा दृश्य देखा और धृतराष्ट्र को दिखाया। द्रौपदी के पांच पति थे। चीरहरण में कृष्ण ने साड़ियों की नदी बहा दी। ये सब ऐसे दृश्य हैं, जिनके भीतर जाकर उनका सत्य जानना कठिन है। हमारी युवावस्था में भी कई दृश्य ऐसे घटे, जो वृद्धावस्था तक चले आते हैं। तब इंद्रियां तो अपना काम दिखाएंगी ही और एक वृद्ध व्यक्ति बाहर से भले शांत दिखे पर भीतर से घोर अशांत होगा। इसीलिए अनेक वृद्धों के जीवन में व्याधियां उतर जाती हैं।



