इन दिनों माता-पिता बच्चों का विवाह करने के बाद इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि विवाह सफल होगा या नहीं। पहले परमात्मा से प्रार्थना की जाती थी कि विवाह अच्छे से संपन्न हो जाए। पर अब माता-पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि बच्चों का विवाह अच्छा चल जाए। मन में भय है, पता नहीं कब रिश्ता टूटने की खबर आ जाए। हमारे परिवार के जीवन में जिन-जिन परंपराओं का स्वरूप बदला, उनमें विवाह भी है। पहले शुद्ध वैदिक विवाह होता था, समाज और परिवार की सहमति से। इसको अरेंज्ड मैरिज कहते हैं। फिर भोग-विलास तो हो पर दीर्घ जिम्मेदारी न उठानी पड़े, इसके लिए लिव-इन रिलेशनशिप आ गई। लव मैरिज को तो लोग समझ ही नहीं पाए। रोमांस और लव मैरिज में फर्क है। रोमांस जैसे ही मैरिज में बदलता है, जीवन के कई कटु सत्य सामने आते हैं। और जरूरी नहीं कि यह सफल हो जाए। नई पीढ़ी विवाह को ठीक से समझे और स्वीकारे, वरना परिवार की परंपराओं का यह पहरुआ अपने-आप दम तोड़ देगा।



