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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:जब मां-पिता काम पर जाते हैं तो बच्चों की देखभाल कौन करता है‌?

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डे-केयर में रोता बच्चा डांट नहीं, दुलार मांगता है। उसे आवाज, कोमल स्पर्श, गोद, खिलौना या फिर एक गीत चाहिए। बेंगलुरु से आई खबरों ने इसी भरोसे को तोड़ दिया। रिपोर्टों के अनुसार, कैपजेमिनी के ब्रुकफील्ड परिसर के डे-केयर के वीडियो में दो वर्ष तक के बच्चों को बाथरूम में बंद करने तथा टॉयलेट जेट से पानी मारने जैसी क्रूरताएं दिखीं। पांच केयरगिवर पर मामला दर्ज किया गया और अब सेंटर को बंद करा दिया गया है। यह किसी अनियमित क्रेच में नहीं हुआ, बल्कि भारत की तकनीकी राजधानी के कॉर्पोरेट परिसर में यह घटना घटी है। ऐसे केंद्र माता-पिता को भरोसा देते हैं कि बच्चा सुरक्षित है, अब आप काम कीजिए। वही भरोसा टूट गया। यह मामला सवाल उठाता है कि जब माता-पिता काम करते हैं तो उसकी कीमत कौन चुका रहा होता है? शहरी मध्यवर्ग के लिए दोनों पैरेंट की आय अब विलासिता नहीं, जरूरत बन चुकी है। मकान, स्कूल, स्वास्थ्य, घरेलू मदद, बीमा, ईएमआई ने परिवारों को दबाव में रखा है। महिलाओं का काम करना उनकी गरिमा, स्वतंत्रता, प्रगति से भी जुड़ा है। भरोसेमंद चाइल्डकेयर न हो तो कई महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं। इसलिए क्रेच जरूरी हैं, पर सुरक्षित क्रेच ज्यादा जरूरी हैं। जब माता-पिता लंबे समय तक काम करते हैं, तो बच्चे का दिन डे-केयर, नैनी, स्क्रीन, एक्टिविटी क्लास और थके माता-पिता के बीच बंट जाता है। समय के बिना प्यार व्यवस्था बन जाता है। उपस्थिति के बिना स्नेह प्रबंधन बन जाता है। पालन-पोषण सप्ताहांत का काम बन जाता है। लेकिन बच्चों को माता-पिता चाहिए। उन्हें बिना मोबाइल के भोजन, सोने से पहले कहानी, सवालों के जवाब, शांत माहौल और सुरक्षित नींद चाहिए। बचपन स्कूल से पहले का इंतजार नहीं है। यही समय है जब शरीर, मस्तिष्क और भावनाएं तेजी से विकसित होती हैं। यूनिसेफ इसे पोषण, सुरक्षा, प्रारंभिक सीख और संवेदनशील देखभाल की महत्वपूर्ण अवधि मानता है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ पहले 1000 दिनों पर जोर देते हैं। एनएफएचएस-6 के अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के 29.3% बच्चे ठिगनेपन, 19% कमजोरी और 31.8% कम वजन से जूझ रहे हैं। बच्चा भोजन के साथ स्पर्श, भाषा और भरोसे से भी बढ़ता है। पिछले कुछ दशकों में कई देशों ने माना है कि चाइल्डकेयर कोई निजी इंतजाम नहीं, सामाजिक ढांचा है। यूनिसेफ चाइल्डकेयर और पैतृक अवकाश को साथ देखता है, क्योंकि बच्चों को देखभाल चाहिए और वयस्कों को वर्क-लाइफ संतुलन। देखभाल केवल मां की नहीं, माता-पिता और समाज की साझा जिम्मेदारी है। भारत में दोनों पैरेंट के काम करने का मॉडल बढ़ रहा है, पर उसे मानवीय बनाने वाली व्यवस्था नहीं बनाई गई है। हमारे पास टेक्नोलॉजी पार्क हैं, पर चाइल्डकेयर नियमन कमजोर है। लॉन्ग ट्रैवल ऑवर्स हैं, पर फ्लेक्सिबल वर्किंग सीमित है। घरेलू कामगार बच्चों को संभालते हैं, जबकि उनके खुद के बच्चे असुरक्षित रहते हैं। हम पढ़ाई के महंगे कोर्स तो खरीदते हैं, लेकिन बच्चों को समय कम देते हैं। समाधान भी स्पष्ट हैं। हर क्रेच और डे-केयर पंजीकृत, निरीक्षित और ऑडिटेड होना चाहिए। केयरगिवर को अच्छा वेतन, प्रशिक्षण और निगरानी मिले। उन्हें बाल विकास, सुरक्षित व्यवहार और अहिंसक अनुशासन सिखाया जाए। नियोक्ता चाइल्डकेयर को सुविधा नहीं, जिम्मेदारी मानें। फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर, तय घंटे, हाइब्रिड विकल्प और मां-पिता के लिए अवकाश बच्चों को माता-पिता उपलब्ध कराते हैं। आखिर यह जीवन को बच्चों की सुरक्षा और भावनात्मक जरूरतों के अनुसार गढ़ने का सवाल है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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