अशोक सिर्फ 21 साल के थे। उन दिनों नौकरियां बहुत कम थीं। उनकी बेचैनी उन्हें हमेशा आर्म्ड फोर्सेज में अवसर तलाशने को प्रेरित करती थी। फिर एक मौका आया। वैसा नहीं, जैसा उन्होंने सोचा था लेकिन उस राह पर कदम रखने के काफी करीब था। यह सीआरपीएफ में एक पद था। उन्होंने किस्मत आजमाने का फैसला किया। वहां पहले से ही सैकड़ों लोग थे। उत्सुक और उम्मीद से भरे हुए। जब उन्हें बताया गया कि रेजिमेंट को मुश्किल और दूर-दराज के इलाकों में तैनात किया जाएगा तो आधे-से ज्यादा लोग चले गए। फिर बहुत-से इसके बाद हुए टेस्ट राउंड्स में बाहर हो गए। अशोक टिके रहे, क्योंकि उनमें कुछ हासिल करने की जिद थी। उस थकाऊ दिन के खत्म होने से पहले मेजर केके चटर्जी की नजर भूखे और थके हुए अशोक पर पड़ी। मेजर चटर्जी आर्मी के बाद अपनी दूसरी सर्विस कर रहे थे। वे अशोक को ऑफिसर्स मेस ले गए। उन्हें भरपेट खाना खिलाया और फिर कुछ ऐसा किया, जिसकी उम्मीद नहीं थी। मेजर ने अशोक को अपनी पत्नी से मिलवाया। किसी उम्मीदवार या रिक्रूट के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जो पहले ही अपना योगदान दे चुका हो। मेजर ने अशोक के बारे में इतनी उदार बातें कीं कि अभी सिलेक्शन का इंतजार कर रहे अशोक को खुद भी नहीं पता था कि उनमें इतनी खूबियां हैं। पत्नी ने मेजर की बातें पूरे ध्यान से सुनीं। उनकी आंखों में उत्सुकता थी और पति के किसी दबाव के बिना उनके होंठों से शब्द निकले जा रहे थे। उन शब्दों ने अशोक की सारी थकान मिटा दी। ऐसा होता भी क्यों नहीं? अच्छे कपड़ों में सजी-धजी, शालीन महिला के शब्द दुबले-पतले अशोक के गले में किसी माला के समान थे। उन्हें लगा कि जॉइनिंग से पहले ही उन्होंने अपनी एक जगह बना ली है। अशोक को महसूस हुआ कि उन्हें उनके भावी पद या भूमिका के लिए नहीं, बल्कि उन प्रयासों के लिए पहचाना जा रहा है, जो वे यहां तक पहुंचने के लिए कर चुके थे। आधिकारिक तौर पर ड्यूटी शुरू करने से पहले ही एक कमांडिंग ऑफिसर ने उन पर भरोसा किया, उनसे गर्व के साथ बात की और उनकी पत्नी ने भी प्रशंसा की। यह अशोक चौकुलकर का पहला सबक था, जो इतने वर्षों में स्कूल और कॉलेज की कोई किताब नहीं सिखा पाई- किसी युवा व्यक्ति द्वारा हासिल की गई उपलब्धि को जल्दी स्वीकारना, बिना इंतजार किए उसे प्रोत्साहित करना और लीडरशिप को महज आदेश देने के काम से आगे लेकर जाना। अपनी पहली किताब ‘कॉर्न ऑन द कॉब एंड स्टोरीज- पोर्ट्रेट्स ऑफ लाइफ’ में इस अनुभव को अशोक अपने ही शब्दों में बताते हैं कि मेजर ने उनसे अपने नियुक्ति पत्र का मसौदा खुद ही बनाने को कहा, जिसे वायरलेस रेडियो के जरिए वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा जाना था। यह उनका दूसरा सबक था कि जिम्मेदारी सुविधा का इंतजार नहीं करती। उस दिन नियुक्ति पत्र मिलने से पहले ही अशोक ने सीखा कि जब वे लोगों का चयन करेंगे तो उन्हें कैसे प्रस्ताव तैयार करना सीखना होगा। वह सुबह 7 बजे घर से निकले थे और रात 9 बजे के बाद लौटे, लेकिन एक अंतर था- उनके हाथ में नियुक्ति पत्र था। उनकी किताब आपको आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा ले जाती है, जहां उन्हें पहले दिन की ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करना था। वहां से कैसे उनकी बटालियन, 36 वाहनों के काफिले से मध्य प्रदेश के नीमच गई। और फिर अचानक आधी रात में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) भेज दी गई, जहां उन्हें पुलिस विद्रोह से निपटने में मदद करना था। उन्हें कई दिनों वहां एक पहाड़ी पर चंद बड़े पेड़ों के नीचे रहना पड़ा। इस किताब ने मुझे जो सिखाया, वह सिर्फ कहानियां ही नहीं हैं। इसके हर चैप्टर में ऐसा सबक है, जिसके बारे में आज के ज्यादातर बच्चे और कॉर्पोरेट लीडर्स तक नहीं जानते। पैसे की बहुतायत के कारण हमारे बच्चे सबसे बेहतर सुविधाओं की मांग करने लगे हैं और हमारे लीडर हमारी युवा पीढ़ी की सबसे बेहतर खूबियों को ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं। फंडा यह है कि जब आगे-आगे प्रोत्साहन चलता है तो लोग दिल से उसका अनुसरण करते हैं। वे सिर्फ सैलरी के लिए काम नहीं करते बल्कि उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि किसी ने उनमें गर्व का बीज बो दिया होता है।



