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एन. रघुरामन का कॉलम:बिजनेस मॉडल बदलने के लिए माइंडसेट बदलना जरूरी है

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ग्रामीण भारत की वे कालजयी तस्वीरें याद कीजिए। बच्चे नंगे पैर कीचड़ भरी सड़कों पर नाच रहे हैं। पानी से भरे गड्ढों में छप-छप कर रहे हैं। पहली बारिश में भीगते हुए दोनों बांहें फैलाकर शाहरुख खान का आइकॉनिक पोज बना रहे हैं। शहरी लोगों को यह बारिश का गर्मजोशी भरा जश्न लगता है। लेकिन उन बच्चों के लिए यह खेल से कहीं ज्यादा है। वे जानते हैं कि बारिश की हर बूंद का मतलब है जीवन- पारिवारिक खेतों के लिए पानी, मवेशियों के लिए चारा, थाली का भोजन और भविष्य की उम्मीद। लेकिन इस बार मानसून में ऐसे दृश्यों का टोटा है। अल-नीनो के कारण अनियमित और देरी से हुई बारिश ने खेती की लय ही नहीं बिगाड़ी, बल्कि इन मासूम खुशियों को भी छीन लिया। आमतौर पर बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजने वाली गांवों की सड़कें अधिक समय तक धूल से भरी रहीं। जब मानसून ठहर जाता है तो सिर्फ फसलें ही नहीं, पूरा ग्रामीण बचपन भी उसका इंतजार करता है। इसीलिए महाराष्ट्र के जालना जिले में चल रहे एक प्रयोग पर पूरे देश का ध्यान जाना चाहिए। करीब 16 लाख एकड़ कृषि भूमि में फैला यह जिला खेती की सोच में उल्लेखनीय बदलाव की कोशिश कर रहा है। हजारों किसान एक जैसी फसल बोएं और एक जैसा ही जोखिम उठाएं, इसके बजाय जालना की जिला कलेक्टर आशिमा मित्तल एक अभियान शुरू कर 778 ग्राम पंचायतों के 970 गांवों से अपील कर रही हैं कि वे हर गांव में कम से कम 20 एकड़ जमीन कम पानी में होने वाली और अधिक कीमत की फसलों के लिए अलग रखें। इनमें चिया सीड्स, शहतूत, अलसी, सफेद मूसली, शतावरी और रेशम उत्पादन जैसी फसलें शामिल हैं। यह फसलों में योजनाबद्ध विविधीकरण की कोशिश है। ऐसे दौर में, जब जलवायु-अनिश्चितता न्यू नॉर्मल बन गई है तो अप्रत्याशित मानसून की चुनौती के खिलाफ यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण जमीनी पहलों में से एक बन सकती है। सिर्फ जालना ही नहीं, पंजाब भी दशकों से एक सीख देता रहा है। भूजल स्तर में गिरावट के बावजूद वहां कृषि में धान की खेती का दबदबा रहा है। लेकिन आज कई प्रगतिशील किसान जमीन के एक हिस्से में मक्का, सब्जियां और फलों के बाग लगा रहे हैं। सिक्किम अलग सोच का सबसे मजबूत उदाहरण पेश करता है। वहां के किसानों ने पूरे राज्य में जैविक खेती अपनाकर उत्पादन की मात्रा के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय प्रीमियम बाजारों तक पहुंच बनाई है। इस बदलाव में धैर्य लगा, लेकिन आज राज्य की एक खास पहचान है, जो अधिक कीमत चुकाने वाले ग्राहकों को आकर्षित करती है। ओडिशा के आदिवासी जिले बिल्कुल अलग मॉडल प्रदर्शित करते हैं। हल्दी, अदरक और औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसानों ने किसान उत्पादक संगठनों के जरिए पारिवारिक आय में उल्लेखनीय सुधार किया है। ये संगठन उपज एकत्र करते हैं, क्वालिटी बेहतर बनाते हैं और अच्छे दामों के लिए मोलभाव करते हैं। कम बारिश और अत्यधिक तापमान वाले गुजरात के कच्छ में किसानों ने ड्रिप सिंचाई से बंजर जमीन को अनार, खजूर और ड्रैगन फ्रूट के लाभकारी बागानों में बदल दिया है। कभी नामुमकिन लगने वाली चीज आज फलती-फूलती बागवानी आधारित अर्थव्यवस्था बन चुकी है। जालना का ‘20 एकड़ मॉडल’ इसीलिए इतना प्रभावशाली है, क्योंकि यह किसानों से जमीन के सिर्फ छोटे-से हिस्से पर प्रयोग करने को कहता है। पांच एकड़ जमीन वाले किसान को पूरा खेत दांव पर लगाने की जरूरत नहीं है। विस्तार करने से पहले वह नई फसल को महज आधा एकड़ जमीन देकर भी आय, लागत और जोखिम की तुलना कर सकता है। इन सभी उदाहरणों में एक समान सबक है। इन सभी ने अपनी जमीन को क्लाइमेट अडॉप्शन की जीती-जागती प्रयोगशाला में बदल दिया। सफलता हमेशा अधिक जमीन पर खेती से नहीं मिलती। अकसर यह इस बात से मिलती है कि जमीन से समझदारी भरी पैदावार कैसे ली जाए। इस साल जून में सामान्य से कम बारिश और कमजोर मानसून ने पहले ही यह चिंता बढ़ा दी है कि वर्षा आधारित किसान फिर-से पैदावार का नुकसान झेल सकते हैं। ऐसे में फसलों की विविधता और जलवायु-अनुकूल खेती पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है। फंडा यह है कि आज खेती में भी वित्तीय सलाहकारों जैसी सोच चाहिए, जो अकसर निवेशकों से कहते हैं कि सारा पैसा किसी एक शेयर या संपत्ति में न लगाएं। जब कोई निवेश उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न करे तो विविधता आपके कारोबार और संपत्ति को सुरक्षित रखती है।

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