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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चों को ऐसी दुनिया से बचाइए, जो काम से ज्यादा दिखावे को महत्व देती है

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हमारे बच्चे और टीनेजर्स आज जितनी बड़ी संख्या में भावनात्मक तनावों का सामना कर रहे हैं, उनसे पार पाना मुश्किल लग सकता है। इनमें नींद की कमी, एकेडमिक प्रेशर और अकेलापन जैसी चीजें शामिल हैं। लेकिन दुनिया में जिस समस्या का इलाज करा रहे युवाओं की संख्या बढ़ रही है, वह है- एंग्जायटी। और यही पैरेंट्स की भी सबसे बड़ी चिंता है। एंग्जायटी से जूझ रहे बच्चे अकसर चीजों से बचते हैं, अलगाव का अत्यधिक भय दिखाते हैं या चिपके रहते हैं। बार-बार पेटदर्द जैसी परेशानियों की शिकायत करते हैं, जिनका कोई स्पष्ट कारण नहीं होता। अचानक गुस्सा हो जाते हैं। आमतौर पर ऐसे बच्चे बार-बार भरोसा मांगते हैं। इस बारे में बहुत-से विशेषज्ञों की सलाह का कलेक्शन यहां पेश है। इन्टेंसिव पैरेंटिंग बंद करें: हम ‘हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग’ के दौर में जी रहे हैं, जहां पैरेंट हमेशा बच्चे पर नजर रखते हैं। संस्कृति हम पर दबाव डाल रही है कि अच्छे पैरेंट्स बच्चे के जीवन में संघर्ष आने ही नहीं देते। ऐसी पैरेंटिंग का एक कारण सुरक्षा चिंताएं भी हो सकती हैं। हाल ही में एक छोटे बच्चे के शारीरिक उत्पीड़न का वीडियो वायरल होने के बाद बेंगलुरु के ब्रूकफील्ड स्थित कैपजेमिनी के एचएएल कैंपस की क्रेच के दो केयरगिवर्स को गिरफ्तार किया गया। लेकिन दुर्भाग्य से पैरेंट्स जितनी ‘ओवर पैरेंटिंग’ करते हैं, बच्चा उतना ही कम क्षमतावान हो जाता है। 3 साल का बच्चा भी कठिन कार्य कर सकता है: मैंने देखा है कि बच्चों के लिए म्यूजिक या डांस की पहली क्लास डरावनी होती है। वे रोते हैं और मां को छोड़कर दूसरे किसी ग्रुप में जाने से इनकार करते हैं। लेकिन उन मांओं को भरोसा होता है कि बच्चा यह कर सकता है। उनमें से ज्यादातर कहती हैं कि ‘अभी यह मुश्किल लग रहा है, क्योंकि तुमने पहले कभी नहीं किया। लेकिन मम्मा जानती है कि तुम कर सकते हो।’ ये सुनते ही बच्चे तुरंत डांस नहीं करने लगते। बल्कि, कई हफ्तों तक क्लासरूम के दरवाजे पर खड़े रहते हैं। फिर धीरे-धीरे शांत होकर क्लास जॉइन कर लेते हैं। यही नियम तब भी लागू होता है, जब वे स्कूल जाने से मना करते हैं। भावनाएं तथ्य नहीं होतीं: जब बच्चा परेशान हो तो पैरेंट के तौर पर आपको भी परेशान नहीं होना चाहिए। जब आप प्यार से कहते हैं, ‘ओह, क्या तुम्हें यह काम करने में बुरा लग रहा है’ तो बच्चे की एंग्जायटी और बढ़ती है। उन्हें ‘असहज और असुरक्षित’ महसूस होता है, जिससे उनके मन में भावना आती है कि ‘मैं यह नहीं कर सकता’ या ‘यह मेरे लिए नहीं है।’ इसलिए हमेशा भावनाओं और तथ्यों में फर्क करने का प्रयास करें। एकेडमिक प्रेशर दुश्मन है: बहुत से लोग मानते हैं कि किसी भी स्कूल में नंबर ही सबसे कीमती हैं। बच्चों से ज्यादा पैरेंट्स उनके नंबरों में रुचि लेते हैं और इसीलिए वे उनके होमवर्क को भी बारीकी से प्रबंधित करने लगते हैं। यदि आप होमवर्क में दखल देना बंद करें तो बच्चे ज्यादा मोटिवेटेड और एंगेज्ड महसूस करेंगे। बच्चों की पढ़ाई में पैरेंट्स को खुद ही मुख्य कर्ता-धर्ता बनने के बजाय सपोर्टिव रोल निभाना चाहिए। अकेलापन बड़ी समस्या है: खराब मानसिक स्वास्थ्य का मुख्य कारण यही है। बच्चों के दोस्तों को घर बुलाकर इससे निपटने में उनकी मदद करें। स्क्रीन से कनेक्ट होने के बजाय उन्हें दोस्तों से जुड़ने दें। चूंकि बच्चों को ऊर्जा खर्च करने की जरूरत होती है, इसलिए उन्हें स्पोर्ट्स, क्लाइम्बिंग, टहलने, मार्शल आर्ट्स, डांस, साइक्लिंग और एक्सरसाइज के लिए प्रेरित करें। स्क्रीन कभी ऐसे अनुभव नहीं दे सकती। ये तनाव घटाने, साहस विकसित करने और असहजता को सहन कर सकने के शारीरिक तरीके हैं। आप देखेंगे कि उनकी काबिलियत बढ़ रही है। उनसे लगातार बात करते रहिए। मसलन, कॉलोनी के आसपास टहलते हुए उन्हें बताइए कि आपके बचपन में इस इलाके में कितने पेड़ होते थे। कैसे आप उन पर चढ़ते थे और उनके नाम क्या थे। उन्हें अपने बचपन के किस्से भी सुनाएं। फंडा यह है कि अपने बच्चों को ऐसी दुनिया से बचाइए, जो काम से ज्यादा दिखावे को महत्व देती है। उन्हें कन्ज्यूमिंग, स्क्रॉलिंग या सिर्फ सफलता की बातें करने के बजाय कुछ करने, बनाने और समस्याएं सुलझाने का महत्व बताइए। भविष्य में महज देखने या बातचीत करने वालों की तुलना में हमेशा वो लोग आगे रहेंगे, जो कुछ करते हैं।

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