आने वाली 28 अगस्त को मेरे परिवार में एक शादी है। वेन्यू है चेन्नई से 300 किमी दूर कुंभकोणम। सभी रिश्तेदारों को दो महीने पहले ही बता दिया गया है। ताकि वे समय रहते ट्रेन टिकट सुरक्षित कर सकें। लेकिन बात तब बिगड़ने लगी जब लंबा समय और बजट का गणित आपस में टकराने लगा। मुंबई से वहां तक की ट्रेन यात्रा 35 घंटे की है। बुजुर्गों के लिए इतनी लंबी यात्रा किसी जद्दोजहद से कम नहीं है। लिहाजा, ज्यादातर ने नजदीकी एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली के लिए फ्लाइट लेने का मन बनाया। लेकिन असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब फैमिली वॉट्सएप ग्रुप पर शादी का कार्ड आया। कार्ड आते ही बधाई संदेशों की जगह ग्रुप पर इस बात की माथापच्ची होने लगी कि मुंबई से तिरुचिरापल्ली का टिकट 16,000 का है। अब जरा मेहमान का पूरा खर्च समझिए- सोलह हजार की फ्लाइट, एयरपोर्ट से वेन्यू तक 2,500 की टैक्सी, किसी बजट होटल में दो दिन रुकने का चार हजार और दो हजार के अन्य फुटकर खर्चे। इस सब के ऊपर से शगुन अलग। नतीजा यह हुआ कि इन खर्चों ने शादी की खुशियों को दबा दिया। ग्रुप पर ज्यादातर रिश्तेदारों ने अब तक आने की हामी नहीं भरी है। आज के दौर में मिडिल क्लास के लिए शादी अटेंड करने का औसत खर्च इतना बढ़ चुका है कि यह उन्हें शिरकत करने से रोक रहा है। देखा जाए तो हमारे भारतीय समाज में शादियां सामाजिक दायित्व की सबसे बड़ी करेंसी बन चुकी हैं। अगर आप परिवार की किसी शादी में नहीं जाते, तो आप बुजुर्गों के उस ‘सोशल बॉयकॉट’ का रिस्क ले रहे होते हैं जो छह-छह महीने आपसे बात नहीं करते। हमारे रिश्तेदारों के दिमाग में एक बहीखाता चलता है, जिसमें किसने किसकी शादी में हाजिरी लगाई और किसने कितना शगुन दिया, इसका पूरा हिसाब दशकों तक रखा जाता है। आज दिक्कत यह है कि मेजबान इंस्टाग्राम पर परफेक्ट दिखने वाली ‘फेयरीटेल वेडिंग’ के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन कीमत मेहमानों को चुकानी पड़ रही है। बदनामी के इसी डर से कई बुजुर्ग शरीर को कष्ट देकर थकाऊ रास्तों से सफर करने को मजबूर हैं ताकि वे गॉसिप का विषय न बनें। मैनेजमेंट टिप: मोगरे के फूलों की खुशबू, सोशल मीडिया की तस्वीरों का हिस्सा बनने के लिए बजट न बिगाड़ें। दिखावे के दौर में अपनी जेब और मानसिक शांति को बचाना सबसे बड़ा एसेट मैनेजमेंट है। शादी में खुद जाने के बजाय उपयोगी उपहार भेज दें, जो नए जोड़े के काम आए, आपके स्वाभिमान को सुरक्षित रखे।



