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एन. रघुरामन का कॉलम:क्या मोबाइल ने इमरजेंसी में हमारी प्रतिक्रिया को बदल दिया है?

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मेरे लिए साढ़े चार दशक पहले, डोंबिवली से वीटी (अब सीएसएमटी) का मुंबई लोकल ट्रेन का सफर सालों-साल एक आध्यात्मिक यात्रा जैसा रहा। वजह थी ट्रेन के डिब्बे में भजन गाने वाली मंडलियां। मेरी मां खास तौर पर कुछ स्नैक्स पैक करके देती थीं, जिन्हें नैवेद्यम् मानकर पहले भगवान को चढ़ाते और फिर सबमें बांटते थे। इससे रोज-रोज का उबाऊ सफर भक्ति के खूबसूरत अनुभव में बदल जाता था। नैवेद्यम् सिर्फ ग्रुप के लोगों को ही नहीं, बल्कि रोज के यात्रियों और अनजान सह-यात्रियों तक को बांटा जाता था। लोग भी पूरे श्रद्धाभाव से प्रसाद लेते थे। शाम को यही ग्रुप फिर इकट्ठा होकर घर लौटता। लौटते वक्त कोई ताश खेलता, कोई शतरंज, तो कोई अंताक्षरी। कुछ कुंवारे लड़के ट्रेन में ही सब्जियां काट लेते, ताकि घर पहुंचकर खाना बनाना आसान हो जाए। ग्रुप का हर इंसान उतरते समय सीट दूसरों को दे देता था। ऐसा नहीं था कि डिब्बे का दरवाजा बंद करने को लेकर कभी झगड़े नहीं होते थे, खासकर बारिश में। लेकिन जब भी ऐसी बहस होती, तो ग्रुप में से कोई आवाज बीच में पड़ने वाले लोगों को शांत करा देती। अगले दस मिनट में दरवाजा बंद करने का विरोध करने वाले लोग ही दरवाजा बंद करके ग्रुप के साथ भजन गाने लगते। ग्रुप में कोई न कोई खुशमिजाज इंसान होता था, जिसे सब “समझौते का बादशाह’ कहते थे। ग्रुप का मकसद यही था कि सभी कड़ी मेहनत कर रहे हैं, इसलिए कोई भी खराब मूड लेकर काम पर न जाए। मुझे अपना यह पुराना सफर मंगलवार रात हुई एक खौफनाक घटना को सुनकर याद आया। मुंबई में सीजन की पहली बारिश हो रही थी और दो लोग, मयंक लोहार (उम्र 22 साल) और रोशन सुवर्णा, लोकल के डिब्बे के दरवाजे के पास खड़े थे। सह-यात्रियों ने दरवाजा बंद करने को कहा, जिस पर मयंक तो मान गया लेकिन रोशन नहीं माना। मयंक ने जबर्दस्ती दरवाजा बंद करने की कोशिश की, तो नशे में धुत रोशन ने गुस्से में बैग से खंजर निकाला और मयंक के पेट और छाती पर कई वार किए। अस्पताल ले जाते समय मयंक की मौत हो गई। उस फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में तीस से ज्यादा लोग थे और मेरा मानना है कि उनमें से किसी को हिंसा पसंद नहीं होगी। फिर भी, किसी ने भी पीड़ित की मदद नहीं की, न ही हमला रोका। कुछ लोगों ने पुलिस को फोन जरूर किया, लेकिन ज्यादातर हमले और उसके बाद के मंजर का वीडियो बनाते रहे। सोशल मीडिया पर आए वीडियो इसका पुख्ता सबूत हैं। चलिए मान लेते हैं कि यात्री डर गए थे और सदमे में थे। लेकिन उन्हें जोर से चिल्लाने से किसने रोका था? अगर सब मिलकर शोर मचाते, तो कातिल का ध्यान भटक सकता था। अगर वे सब भजन मंडली, ताश या शतरंज के शौकीन या अंताक्षरी खेलने वाले किसी ग्रुप की तरह एक-दूसरे पर भरोसा करने वाले होते, तो रोशन 30 लोगों पर भारी नहीं पड़ पाता। बदकिस्मती से, उस ग्रुप में मौजूद सभी लोग बिलकुल ‘अकेले’ थे। शायद उन्होंने सोचा कि खतरे के दायरे से बाहर रहकर वीडियो बनाना सुरक्षित तरीका है। वरना मयंक को चाकू मारने के बाद रोशन धीमी होती ट्रेन से उतरकर कैसे भाग निकला और पुलिस के हत्थे चढ़ने से पहले 15 घंटे कैसे गायब रहा? मनोवैज्ञानिक रूप से, ट्रेन में सभी सोचते रहे कि कोई दूसरा इंसान, शायद कोई ज्यादा ताकतवर व्यक्ति बीच-बचाव करेगा और इसी सोच में सब तमाशबीन बने रहे। फंडा यह है कि हमें अपने दिमाग को यह समझाना होगा कि भीड़ में ‘अकेले’ चलने के बजाय, हमें एक समाज के रूप में रहने और सामूहिक भलाई के बारे में सोचने की जरूरत है।

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