हर सप्ताह मैं मुंबई के माटुंगा स्थित साउथ इंडियन भजन समाज मंदिर जाता था। मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर शांत भाव से, सामान्य कपड़े पहने बैठे एक भिखारी के अनेक श्रद्धालु अभ्यस्त हो चुके थे। अन्य भिखारियों के उलट वह भीख नहीं मांगता था और इसके बजाय आंखें बंद किए, हाथ जोड़े प्रार्थना में लीन रहता था। कुछ लोग उसके सामने बिछे अंगवस्त्र पर सिक्के रख देते थे, क्योंकि उन्हें उसके चेहरे पर भक्ति का भाव दिखाई देता था, जबकि कई लोग बिना रुके आगे बढ़ जाते थे। सड़क के दूसरी ओर एक लोकप्रिय दक्षिण भारतीय रेस्तरां था, जिसका संचालन तमिलनाडु के एक होटल व्यवसायी द्वारा किया जाता था। आजकल उस इमारत का री-डेवलपमेंट चल रहा है। यह रेस्तरां हर सुबह नाश्ते और दोपहर में भोजन के समय खचाखच भरा रहता था। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद पारंपरिक धोती और अंगवस्त्र पहने, माथे पर विभूति और कुमकुम लगाए लोग वहां पहुंचते थे। उनमें कुछ नियमित रूप से आने वाले थे, जबकि कुछ मेरी तरह कभी-कभार आते थे। एक दोपहर रेस्तरां के एक नियमित ग्राहक कल्याण सुंदरम चुपचाप मालिक के पास गए और पूछा, क्या आपको पता है कि यहां कुछ लोग खाना खाकर बिना पैसे दिए चले जाते हैं? मालिक कुछ कहते, उससे पहले ही उन्होंने रेस्तरां के बाहर खड़े धोती पहने एक व्यक्ति की ओर इशारा किया। सुंदरम ने कहा, मैं कई दिनों से उस पर नजर रख रहा हूं। वह आमतौर पर मेरे बाद रेस्तरां में प्रवेश करता है। जैसे ही आपका ध्यान कहीं और जाता है- मसलन जब आप कोई गिरा हुआ सिक्का उठाने के लिए झुकते हैं या वेदी पर अगरबत्ती जलाने लगते हैं तो वह पैसे दिए बिना चुपचाप बाहर निकल जाता है। मालिक ने उस व्यक्ति की ओर देखा और मुस्कराते हुए कहा, अच्छा वह आदमी? लेकिन ऐसा सिर्फ कुछ दिनों से नहीं हो रहा है। मेरा तो मानना है कि वह कई महीनों से यहां बिना पैसे दिए खाना खा रहा है। यह सुनकर ग्राहक हैरान रह गया। उसने कहा, आप जानते हैं कि वह आपको धोखा दे रहा है, फिर भी उसे ऐसा करने दे रहे हैं? तुरंत जवाब देने के बजाय मालिक उन्हें धीरे से एक ओर ले गए। इस बीच वे इंतजार कर रहे कुछ ग्राहकों को भोजन परोसते रहे। फिर मंदिर की ओर इशारा करते हुए बोले, देखिए, वह प्रार्थना कर रहा है। आपको क्या लगता है, इस समय वह किस बात के लिए प्रार्थना कर रहा होगा? ग्राहक ने कटाक्ष करते हुए जवाब दिया, शायद वह भगवान को धन्यवाद दे रहा होगा कि वह पकड़ा नहीं गया। मालिक ने सिर हिलाते हुए कहा, आप सही कह रहे हैं। कुछ क्षण रुकने के बाद उन्होंने एक और सवाल पूछा, और आपको क्या लगता है, मेरे रेस्तरां में प्रवेश करने से पहले वह क्या प्रार्थना करता होगा? ग्राहक ने आत्मविश्वास से कहा, यही कि वह पकड़ा न जाए। मालिक मुस्कराए और सिर हिलाते हुए बोले, मैं इसमें थोड़ा बदलाव करूंगा। संभवतः वो यह प्रार्थना करता होगा कि रेस्तरां हमेशा इतना खचाखच भरा रहे कि किसी का ध्यान मेरे बाहर निकलने पर ही न जाए। ग्राहक चुप हो गया। मालिक ने आगे कहा, अब बताइए, मेरे परिवार और मेरे अलावा कौन है, जो हर दिन पूरे मन से इस रेस्तरां के हमेशा भरा रहने की प्रार्थना करता हो? ग्राहक कुछ कह पाता, उससे पहले ही मालिक ने स्वयं उत्तर देते हुए कहा, इसीलिए वह व्यक्ति जब भी यहां आता है, मैं जानबूझकर अपनी नजर बाहर निकलने वाले दरवाजे से हटा लेता हूं और उसे चुपचाप जाने देता हूं। ग्राहक अविश्वास से मालिक की ओर देखने लगा। मालिक एक बार फिर मुस्कराए और बोले, कभी-कभी पूरे मन से की गई एक प्रार्थना के बदले एक समय का भोजन बहुत छोटी कीमत होती है।
शनिवार को भोपाल में शिक्षकों की एक सभा को संबोधित करते समय मुझे यह कहानी याद आई। वे शिक्षक अपने स्नातक कार्यक्रमों के लिए विद्यार्थियों का स्वागत करने की तैयारी कर रहे थे। मैंने उनसे कहा कि ऐसे समय में, जब बच्चे एआई की मदद से हर प्रश्न का उत्तर तुरंत पाना चाहते हैं, उनके लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण विवेक का विकास होगा। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे विद्यार्थियों को ‘एक रुका हुआ फैसला’ जैसी फिल्में भी दिखाएं, जिनकी कहानी अपने व्यक्तिगत पूर्वग्रहों, पक्षपात और क्रोध को कम करने में उनकी मदद कर सकती है।

