1978 में मैं बॉम्बे (अब मुंबई) की रोश फार्मास्यूटिकल्स में अपनी पहली जॉब ऑफर के मेडिकल टेस्ट में फेल हो गया था। मैं घबरा गया, क्योंकि नौकरी मिलने से पहले ही मेरे हाथ से चली गई थी। मैंने नागपुर के सीताबर्डी मेन रोड स्थित ‘कृष्णा क्लॉथ सेंटर’ में ट्रंक कॉल बुक की और वहां के मालिक से कहा कि वे मेरे पिताजी को बुलाकर कहें कि मामला बहुत अर्जेंट है। वे वहीं मेरे फोन का इंतजार करें। मैं दस मिनट में वापस कॉल करूंगा। दुकान के मालिक राजी हो गए, लेकिन साथ में पूछ लिया कि ‘सब ठीक तो है?’ मैंने झूठ बोला कि ‘हां।’ मैं भीतर से बेचैन था। हर मिनट बहुत धीरे बीत रहा था। मैंने छह मिनट में फिर कॉल किया। मेडिकल रिजल्ट पढ़कर सुनाया, जिसके आखिर में लिखा था कि ‘अगर आप जॉइन करना चाहते हैं तो आपको यह समस्या ठीक करके फिर मेडिकल टेस्ट देना होगा, ताकि 5 नवंबर से पहले जॉइन कर सकें।’ मैं चुप हुआ तो उन्होंने कहा, ‘हम्म।’ मैंने तुरंत कहा, ‘क्या हम्म? मैं 15 दिनों में यह सब कैसे कर सकता हूं?’ उन्होंने कहा कि ‘अगर ऑपरेटर कॉल करे तो ट्रंक कॉल का समय तीन मिनट और बढ़वा लेना। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं।’ वे सुनाने लगे, ‘18 जुलाई, 1947 की सुबह रॉयल कमीशन हाउस ऑफ लॉर्ड्स में इकट्ठा हुआ, ताकि भारतीय स्वतंत्रता विधेयक पर किंग जॉर्ज-छठवें की सहमति ली जा सके। सुबह 10.40 बजे जीएमटी (शाम 4.10 बजे आईएसटी) क्लर्क ने अनुमोदन के लिए प्रस्तावित विधेयकों के शीर्षक पढ़े। फिर चार शब्द आए- ‘ले रोइ ले वेउत’, जिसका फ्रेंच में मतलब है ‘राजा की यही इच्छा है।’ इन्हीं शब्दों के साथ विधेयक कानून बन गया। 25 जुलाई को सभी राज्यों के शासकों और मंत्रियों को संबोधित करते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने उनसे रक्षा, विदेश मामलों और संचार से संबंधित इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को स्वीकारने का आग्रह किया और इसमें देरी की बहुत कम गुंजाइश छोड़ी। उन्होंने कहा, ‘याद रखिए कि सत्ता हस्तांतरण का दिन करीब है। अगर आपको आना है तो 15 अगस्त से पहले आना होगा।’ सिर्फ दो दिनों में राजनीतिक हलकों ने यह भरोसा जता दिया कि आजादी से पहले सभी राज्य किसी न किसी डोमिनियन यानी शासन (दूसरा पाकिस्तान था) में शामिल हो जाएंगे। अगर पूरा देश महज 18-20 दिनों में तैयार हो सकता है, तो क्या तुम 15 दिनों में खुद को तैयार नहीं कर सकते? आज रात ही कोई ट्रेन पकड़ कर सुबह 10 बजे तक यहां (नागपुर) आ जाओ। इंटरव्यू के लिए मैं अपने जिन अंकल के यहां ठहरा था, उनको बताकर वीटी स्टेशन (अब सीएसटी) पहुंचा। टॉयलेट गया, वह भी कुली को 20 रुपए देकर और नागपुर जाने वाली पहली ट्रेन के अनारक्षित डिब्बे में चढ़ गया। मैंने अपने पिताजी को कोसा, क्योंकि रेलवे कर्मचारी के नाते वे फर्स्ट क्लास का जो पास इस्तेमाल करते थे, उसमें से मेरे 18 साल के होने पर डिपेंडेंट लिस्ट से मेरा नाम हटवा दिया। घर पहुंचने पर मैंने पिताजी से कहा, ‘देख रहे हो अप्पा, आपकी तथाकथित ईमानदारी आपके इकलौते बेटे को कितना दर्द दे रही है, जो फर्स्ट क्लास का टिकट नहीं खरीद सकता?’ पूरे सफर में मैं भूखा, प्यासा और गुस्से में रहा। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। 11वें दिन, जब पिताजी ने पहले ही मेरे लिए रिजर्व्ड थर्ड क्लास टिकट बुक करा लिया था, वे मुझसे बोले कि ‘एक दिन तुम्हें इन मुश्किल भरे दिनों पर गर्व होगा और तुम अपने बच्चों को यह अनुभव सुनाओगे कि कैसे कम उम्र में ही तुम अपनी पहली नौकरी पाने के लिए जिम्मेदारी से खड़े हुए थे।’ ट्रेन चलने लगी तो उन्होंने कहा, ‘टन पेयरे ले सूहैत’ (फ्रेंच में, ‘तुम्हारे पिता की यही इच्छा है’) उनकी आंखें नम थीं। मेरी बॉम्बे वापसी, जो तब से मेरा शहर बन गया, आंसुओं के साथ शुरू हुई। लेकिन इसने मुझे अपनी आजादी के प्रति जिम्मेदार बनाया। मुझे गर्व है कि मैंने अपने पिताजी की बात रखी। फंडा यह है कि स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए थोड़ी जिम्मेदारी के साथ ‘आजादी’ को महसूस करिए। फिर देखिए ये आपको कितना आनंद देती है।


