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आंध्र के अनंतपुर में खेल गरीबी से निकलने का जरिया:स्पोर्ट्स विलेज ने इंटरनेशनल खिलाड़ी दिए, 350 से ज्यादा प्लेयर्स को सरकारी नौकरियां मिलीं

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आंध्र प्रदेश का अनंतपुर जिला अपनी भौगोलिक चुनौतियों, सूखी जमीन और लगातार पड़ने वाले सूखे के लिए जाना जाता है। यहां की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन अनियमित बारिश और सीमित संसाधनों के कारण लोगों की आय और जीवन स्तर हमेशा संघर्षपूर्ण रहा है। रोजगार के अन्य विकल्पों की कमी ने युवाओं और महिलाओं के लिए मुश्किलें और बढ़ा दी हैं, लेकिन इसी बंजर और चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच ‘रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट’ (आरडीटी) पूरे ग्रामीण समाज की दिशा बदल रहा है। 1969 में विसेंट और ऐनी फेरर द्वारा स्थापित इस संस्था ने स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ एक अनूठा प्रयोग किया—खेलों को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का हथियार बनाना। 70 के दशक में साधारण कबड्डी और क्रिकेट टूर्नामेंट से शुरू हुआ यह सफर, साल 2000 में ‘अनंतपुर स्पोर्ट्स एकेडमी’ (एएसए) की स्थापना के साथ एक बड़े आंदोलन में बदल गया। आज यह अकादमी ‘एक्सेस, एजुकेट और एम्पावर’ (पहुंच, शिक्षा और सशक्तिकरण) के सिद्धांत पर काम करते हुए तीन स्तरों पर संचालित होती है। सबसे पहले, सुदूर गांवों में फैले 100 से ज्यादा ग्रासरूट सेंटर्स से प्रतिभाओं को खोजा जाता है। इसके बाद उन्हें बेहतर ग्राउंड, लाइब्रेरी और कंप्यूटर जैसी सुविधाओं वाले 4 विशेष स्पोर्ट्स-एजुकेशन सेंटर्स तक लाया जाता है। जो खिलाड़ी बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, उन्हें ‘अनंतपुर स्पोर्ट्स विलेज’ (एएसवी) की एलीट रेजिडेंशियल एकेडमी में चुना जाता है। यहां उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और ट्रेनिंग का पूरा खर्च स्कॉलरशिप के जरिए उठाया जाता है। आर्चरी, एथलेटिक्स, फुटबॉल, जूडो और टेनिस सहित कुल 10 खेलों में आज 16,400 से अधिक बच्चे हिस्सा ले रहे हैं। इस पहल की सबसे बड़ी कामयाबी गांवों में लड़कियों को लेकर सोच बदलना है। ‘रूरल गर्ल्स एथलेटिक्स मीट’ और गर्ल्स स्पोर्ट्स लीग जैसी कोशिशों के कारण आज खेल कार्यक्रमों में 59% हिस्सेदारी लड़कियों की है। इसके अलावा, स्पेशल ओलंपिक्स और व्हीलचेयर टेनिस के जरिए दिव्यांग और बौद्धिक रूप से कमजोर बच्चों को भी मुख्यधारा में शामिल किया जा रहा है। 1200 से अधिक युवाओं को कोचिंग और रेफरी की ट्रेनिंग दी गई है। लड़कियों के लिए फीमेल एथलीट लीडरशिप प्रोग्राम और बिजनेस वर्कशॉप चलाए जा रहे हैं। इस पूरी मेहनत का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। सालों में 2 लाख से ज्यादा ग्रामीण बच्चों को ट्रेनिंग मिल चुकी है, जिनमें से 2000 से अधिक बच्चे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं। एम. जगदीश (सॉफ्टबॉल) और एम. अनुषा (फुटबॉल) जैसे खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का झंडा बुलंद किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि 350 से ज्यादा युवाओं ने खेलों के दम पर रेलवे, सेना और शिक्षा जैसे सरकारी विभागों में नौकरी हासिल की है। संध्या डी., लोलिता मैरी और भवानी जैसे नाम आज अपने परिवारों के लिए आय का स्थायी जरिया बन चुके हैं। दशकों पहले शुरू हुए गांव के छोटे टूर्नामेंट आज इस बात का सशक्त प्रमाण हैं कि अगर ग्रामीण विकास में खेलों को सही तरीके से पिरोया जाए, तो वह न केवल एक व्यक्ति की जिंदगी संवारता है, बल्कि पूरे समाज को सशक्त और आत्मविश्वास से भर देता है।

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