Hot Topics

अस्मिता ने पिता को, हर्ष ने कोच का भरोसा रखा:साइकिल मैकेनिक की बेटी और मजदूर का बेटा… दोनों ने संघर्ष से जीता कॉमनवेल्थ गोल्ड

Socialblize is your trusted destination for the latest news, trending stories, and insightful updates from India and around the world. We are committed to delivering fast, accurate, and unbiased news that keeps you informed every day.

ग्लासगो में शुक्रवार को भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक दिन रहा। दक्षिण त्रिपुरा के छोटे से शहर बेलोनिया की साइकिल मैकेनिक की बेटी अस्मिता डे और दिल्ली के ककरोला इलाके में मजदूर परिवार से आने वाले हर्ष ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया। एक ने छह महीने पहले पिता को खोने का दर्द सहते हुए इतिहास रचा, तो दूसरे ने आर्थिक तंगी के बीच ऐसा मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचने का सपना हर खिलाड़ी देखता है।
सबसे पहले अस्मिता की कहानी… 10 साल की उम्र में टैलेंट हंट से हुई शुरुआत अस्मिता की प्रतिभा की पहचान साल 2014 में त्रिपुरा खेल विभाग के वार्षिक टैलेंट हंट कार्यक्रम में हुई। तब वह चौथी कक्षा में थीं और उनकी उम्र करीब 10 साल थी। इसके बाद उन्हें त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिला मिला, जहां उन्होंने करीब पांच साल तक ट्रेनिंग ली। साल 2019 में वह भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पहुंचीं, जहां से उनके करियर को नई दिशा मिली। साल 2022 में उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी मिली। इसके बाद से वह उत्तर प्रदेश की ओर से प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं। पिता के निधन के बाद भी नहीं टूटीं
अस्मिता की सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी है। उनके पिता साइकिल मैकेनिक थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। करीब छह महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक से उनके पिता का निधन हो गया। इस सदमे के बावजूद उन्होंने खुद को संभाला। नौकरी से पहले प्रतियोगिता के लिए थे कर्ज त्रिपुरा स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट के एडिशन डायरेक्ट और शुरुआती कोच रहे डॉ. मिहिर शील बताते हैं कि आर्थिक तंगी के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उन पर 4-5 लाख रुपए तक का कर्ज हो गया था। बाद में यूपी पुलिस में नौकरी मिलने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर हुई। कोच बोले- सही सहयोग मिले तो इतिहास बन सकता है डॉ. मिहिर शील कहते हैं,’अस्मिता इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि अगर प्रतिभा को सही समय पर अवसर और सहयोग मिले तो वह इतिहास रच सकती है। साइकिल मैकेनिक के घर से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतना आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ी प्रेरणा है।’ 800 मीटर दौड़ से जूडो तक का सफर अस्मिता ने खेल की शुरुआत 800 मीटर दौड़ से की थी, लेकिन त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में प्रशिक्षकों की सलाह पर उन्होंने जूडो अपनाया। बेलोनिया में बीना देबनाथ और बाद में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल के कोच माणिक लाल देब ने उनकी प्रतिभा को निखारा। राष्ट्रीय स्कूल खेलों और खेलो इंडिया में शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें भोपाल स्थित SAI सेंटर में प्रशिक्षण का मौका मिला। वह भारतीय टीम में जगह बनाने वाली त्रिपुरा की पहली जूडो खिलाड़ी भी बनीं। ‘यह गोल्ड पिता और कोच को समर्पित’ महिलाओं के 48 किलोग्राम वेट कैटेगरी के फाइनल में उन्होंने कनाडा की हाइडी क्वाक को गोल्डन स्कोर में हराकर इतिहास रचा। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में गोल्ड जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बन गईं। गोल्ड जीतने के बाद अस्मिता ने कहा, “यह पदक मेरे लिए, मेरे राज्य और मेरे देश के लिए बहुत खास है। मैं इसे अपने कोच और अपने पिता को समर्पित करती हूं। पिता के निधन के बाद लगा था कि सब खत्म हो गया, लेकिन मैंने खुद को संभाला और आगे बढ़ी।’ अब हर्ष सिंह की कहानी… चौथी कक्षा से शुरू किया जूडो दिल्ली के ककरोला गांव के पास रहने वाले हर्ष का सफर भी कम संघर्षभरा नहीं रहा। कोच हेमतं राठ ने बताया कि हर्ष के पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और मां हाउस वाइफ हैं। ये यूपी के रहने वाले हैं। चौथी कक्षा में हर्ष ने विक्ट्री जूडो क्लब से जूडो की शुरुआत की। इसके बाद लगातार मेहनत करते हुए वह राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। प्रैक्टिस के बाद दूध पीने के भी नहीं थे पैसे हर्ष के कोच हेमंत बताते हैं,’कई बार ऐसा होता था कि प्रैक्टिस के बाद घर जाकर भी उसे दूध नहीं मिलता था। तब हम लोग क्लब में ही उसे दूध पिलाते थे। मेरे साथी सत्यवान गहलोत बच्चों के लिए दूध और अंडों का खर्च खुद उठाते थे। हर्ष ने कभी हार नहीं मानी और लगातार आगे बढ़ता रहा।’ स्कूल नेशनल से कॉमनवेल्थ तक का सफर हर्ष ने स्कूल नेशनल, सीबीएसई नेशनल और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में कई बार सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार जीता। लगातार अच्छे प्रदर्शन के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय टीम में जगह बनाई। आज वह मिलिट्री पुलिस में सेवा दे रहे हैं और कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया। कोच बोले- ओलिंपिक में भी मेडल जीतने का दम कोच हेमंत का मानना है कि हर्ष का सफर अभी और लंबा है। वह कहते हैं,’पहले वह हमारे लिए मेडल जीतता था, अब पूरे देश के लिए गोल्ड जीतकर आया है। मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन वह ओलंपिक में भी भारत के लिए मेडल जीतेगा। वह बेहद अनुशासित और मेहनती खिलाड़ी है।’

Tags :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

About Us

Socialblize is your trusted destination for the latest news, trending stories, and insightful updates from India and around the world. We are committed to delivering fast, accurate, and unbiased news that keeps you informed every day.

Email Us: info@socialblize.com

Contact: +91-7976784661

Socialblize @2026. All Rights Reserved.