आज जब सीजेपी नई पीढ़ी की राजनीतिक आवाज बनकर उभरी है, तब यह याद करना आवश्यक है कि इसकी शुरुआत आखिर हुई कहां से। किसी चुनावी घोषणा-पत्र से नहीं, किसी रैली से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान सीजेआई की एक टिप्पणी से। 15 मई को दिल्ली हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कुछ लोगों को कॉकरोच और परजीवी बताते हुए कहा था कि वे मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर व्यवस्था पर हमला करते हैं। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी केवल उन लोगों के लिए थी, जो फर्जी डिग्रियों के आधार पर वकालत में प्रवेश करते हैं। उनका स्पष्टीकरण ईमानदार था, लेकिन तब तक वह टिप्पणी पूरे देश में फैल चुकी थी। समस्या केवल गलत समझे जाने की नहीं होती, बल्कि कभी-कभी ऐसी बात कह देने की भी होती है जिसे कहने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक यही है। न्यायाधीशों को संयमित भाषा में बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता है। संतुलित और मितभाषी होना न्यायिक पद का आभूषण नहीं, बल्कि उसकी मूल पहचान है। फर्जी डिग्रियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश के सामने एक सीमित और तकनीकी प्रश्न था। वहां कीट-पतंगों की उपमा देने की आवश्यकता नहीं थी। परंतु भारतीय अदालतों में मौखिक टिप्पणियां न्यायिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी हैं। कई लोग इन्हें अदालत की सामान्य बातचीत मानते हैं। कभी जज किसी तर्क की परीक्षा लेते हैं, कभी वकीलों को परखते हैं, तो कभी अपना क्रोध या असहमति व्यक्त कर देते हैं। पहली नजर में यह सब सामान्य लगता है। लेकिन न्यायालय से निकला कोई भी शब्द सामान्य नहीं होता। उसका प्रभाव दूर तक जाता है। हाल ही में वोडाफोन और समायोजित सकल राजस्व विवाद के दौरान कंपनी के शेयरों में बढ़त और गिरावट अदालत की टिप्पणियों के असर से दिखाई दी। पिछले वर्ष सितंबर में जब सरकार ने अदालत में कहा कि वह कंपनी की याचिका का विरोध नहीं कर रही है, तो लिखित आदेश आने से पहले ही कंपनी के शेयरों में तेज उछाल आ गया। अदालत की मौखिक टिप्पणी निवेशकों के लिए संकेत बन गई। टिप्पणियां सकारात्मक परिणाम भी देती हैं। बुलडोजर के माध्यम से की गई अवैध ध्वस्तीकरण कार्रवाई से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि केवल इस कारण किसी पिता का घर नहीं गिराया जा सकता कि उसका बेटा किसी अपराध में आरोपी है। लिखित दिशानिर्देश आने से पहले ही कई राज्यों ने ऐसी कार्रवाइयों पर विराम लगा दिया था। एक टिप्पणी ने कार्यपालिका को उस संयम की ओर प्रेरित किया, जिसे बाद में न्यायालय ने औपचारिक रूप से भी स्वीकारा। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि मौखिक टिप्पणियां अच्छी हैं या बुरी। प्रश्न इससे कहीं सरल, और कहीं अधिक कठिन है- शब्दों का महत्व होता है, और जिनके शब्दों का प्रभाव सबसे अधिक होता है, उन्हें उनका प्रयोग अधिक सावधानी से करना चाहिए। ऐसे समय में सबसे आसान प्रतिक्रिया अकसर नियंत्रण की होती है- यह कि वीडियो क्लिप्स पर रोक लगा दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कुछ सीमा तक यही किया है। परंतु यह अनुचित प्रतिक्रिया है। भारत में अदालतें हमेशा से जनता के लिए खुली रही हैं। यह खुलापन किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि हमारी संवैधानिक परंपरा है। टेक्नोलॉजी ने इस परंपरा का केवल विस्तार किया है। ऐसे समय में पारदर्शिता कम करना परिस्थितियों को समझने में विफलता है। पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने दिखाया है कि कठोर प्रतिबंध किसी आंदोलन को दबाने के बजाय उसे और अधिक बल दे सकते हैं। इससे बेहतर होगा कि न्यायालय अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के बजाय रिपोर्टिंग को अधिक व्यवस्थित बनाएं। जो लोग अदालतों से रिपोर्टिंग करते हैं, उनके लिए अधिक सुदृढ़ मान्यता (अक्रेडिटेशन) व्यवस्था विकसित करने पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। अक्रेडिटेशन सेंसरशिप नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि अदालत की कार्यवाही को कवर करने वाले पत्रकार कानून की पर्याप्त समझ रखते हों और जानते हों कि मौखिक टिप्पणी और न्यायिक आदेश में क्या अंतर है, और कौन-सी टिप्पणी या घटना वास्तव में समाचार है और क्या केवल वायरल सामग्री। और यदि अदालत नहीं चाहती कि उसकी कार्यवाही सोशल मीडिया पर वायरल हो, तो सबसे सरल उपाय यही है कि वह संयम का पालन करे। न्यायाधीश अकसर कहते हैं कि वे केवल अपने निर्णयों के माध्यम से बोलते हैं। लेकिन अगली बार जब अदालत में कोई अतिरिक्त टिप्पणी करने का प्रलोभन हो, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि देश सुन रहा है।
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)


