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डेरोन एस्मोगलु का कॉलम:‘डिजाइनर बेबीज़’ का विचार कई अहम सवाल खड़े करता है

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‘डिजाइनर बेबीज़’ का विचार अब टेक्नोलॉजी की मदद से हकीकत बनता जा रहा है। ये ऐसे जेनेटिकली इंजीनियर्ड बच्चे हैं, जिन्हें आप अपनी पसंद की शारीरिक बनावट और बौद्धिक विशेषताओं के अनुरूप तैयार करवा सकते हैं। यह सम्भावना अनेक गम्भीर सामाजिक और नैतिक सवाल खड़े करती है। जीन-एडिटिंग की बड़ी सफलताएं हाल ही की घटनाएं नहीं हैं। इस क्षेत्र का परिदृश्य 2000 के दशक और विशेष रूप से 2010 के शुरुआती वर्षों में विकसित हुई क्रिस्पर-कैस9 तकनीक के साथ ही बुनियादी रूप से बदल गया था। यह अत्यधिक सटीकता के साथ जेनेटिक-इंजीनियरिंग को सम्भव बनाती है। इसमें एक गाइड-आरएनए किसी प्राणी के जीनोम में विशिष्ट अनुक्रम की पहचान करता है, जहां कैस9 एंजाइम किसी जीन में संशोधन करने का काम करता है। इस तकनीक के उपयोग की सम्भावनाएं व्यापक हैं। इसका इस्तेमाल रोग उत्पन्न करने वाले जीन को निष्क्रिय करने, बीजों और कृषि उत्पादों में संशोधन करने या जरूरत के अनुसार दवाओं और टीकों के विकास में किया जा सकता है। इसमें सिकल-सेल एनीमिया जैसी बीमारियों के साथ-साथ कैंसर जैसे रोगों से जुड़े म्यूटेशंस से निपटने की भी क्षमता है। यह तकनीक भ्रूण अवस्था में- चाहे वह इन-विवो हो या इन-विट्रो- जीन जोड़ने या हटाने की सम्भावना भी पैदा करती है और यहीं से ‘डिजाइनर बेबीज़’ का सवाल सामने आता है। सवाल है कि मनुष्यों में जेनेटिक-इंजीनियरिंग का प्रयोग किसी व्यक्ति तक सीमित रहता है या इसकी मदद से ऐसे परिवर्तन भी किए जाएंगे, जो अगली पीढ़ियों तक विरासत के रूप में पहुंचते हों। एआई विशाल मात्रा में उपलब्ध डेटा का विश्लेषण कर ऐसे जीन-कॉम्बिनेशंस की पहचान कर सकता है, जो केवल रोग की संभावना ही नहीं, बल्कि शारीरिक बनावट, दमखम और संज्ञानात्मक क्षमता के विभिन्न आयामों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यह संभावना स्पष्ट नैतिक प्रश्न भी खड़े करती है। एल्डस हक्सले के उपन्यास ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ की तरह ये ‘डिजाइनर बेबी’ हमें ऐसे परिदृश्य के करीब ले जा सकते हैं, जहां जेनेटिक्स के आधार पर समाज में विभाजन हो जाए और केवल सम्पन्न लोगों के पास ही अपनी तथा अपनी आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक क्षमता, शारीरिक प्रदर्शन और उम्र को बेहतर बनाने के साधन उपलब्ध हों। ऐसी स्थिति में आज जिनके पास पैसा है, वे हर पीढ़ी के साथ और अधिक समृद्ध तथा जेनेटिक रूप से अधिक सक्षम बनते जा सकते हैं। पॉलीजेनिक स्क्रीनिंग पर आधारित भ्रूण-चयन सेवाएं पहले ही आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) कराने वाले मरीजों को व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं। एआई में हुई प्रगति ने उन्हें उन लोगों के लिए और आकर्षक बना दिया है, जो इनका खर्च उठा सकते हैं। यदि यह ट्रेंड जारी रहा तो भविष्य में अरबपतियों का ऐसा वर्ग उभर सकता है, जो अपने आर्थिक-विशेषाधिकारों को बायोलॉजिकल-बढ़त में बदलने के लिए कमर कस चुके हों। यह तब हो सकता है, जब बड़ी संख्या में अन्य लोग एआई के कारण रोजगार छिनने की आशंका का सामना कर रहे हों। ऐसी सम्भावनाओं को रोकने के लिए अधिकांश लोगों की पहली प्रतिक्रिया जर्मलाइन-एडिटिंग और ‘डिजाइनर बेबीज़’ पर पाबंदी लगाने की होती है। लेकिन शायद यह सही समाधान न हो। आखिर हम पहले ही वैक्सीनों और ऑपरेशनों के जरिए अपने शरीर और अपने बच्चों को एक तरह से ‘डिजाइन’ करते ही हैं। विकसित देशों में अब पैरेंट्स बनने जा रहे जोड़े भ्रूण में डाउन सिंड्रोम जैसी बीमारियों की जांच कराते हैं और आवश्यकता पड़ने पर गर्भावस्था समाप्त करने का विकल्प चुनते हैं। इन हस्तक्षेपों और जीनोम-एडिटिंग के बीच की रेखा उतनी स्पष्ट नहीं है, जितनी दिखाई देती है। यदि बच्चों में चेचक के विरुद्ध प्राकृतिक इम्युनिटी विकसित करने के लिए जीन-एडिटिंग की जाए, तो क्या वह उन्हें वैक्सीन लगाने से अलग होगा? बात केवल प्रकृति में हस्तक्षेप करने की ही नहीं है। इससे जुड़े दो और महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, जर्मलाइन-एडिटिंग के दूरगामी प्रभावों को अभी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। जीवित प्राणी लगातार विभिन्न रोगाणुओं के आक्रमण का सामना करते रहते हैं और कुछ जेनेटिक-बदलाव ऐसी अप्रत्याशित समस्याएं पैदा कर सकते हैं, जिनका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता। दूसरे, टीकाकरण एक सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप है, जबकि जीनोम-एडिटिंग केवल अमीरों की पहुंच में होगी। वे इसका इस्तेमाल ऐसे फायदे उठाने के लिए कर सकते हैं, जिनकी हम अभी कल्पना भी नहीं कर सकते। ये ‘डिजाइनर बेबी’ हमें ऐसे परिदृश्य के करीब ले जा सकते हैं, जहां जेनेटिक्स के आधार पर समाज में विभाजन हो जाए और सम्पन्न लोगों के पास ही अपनी तथा आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक क्षमता, शारीरिक प्रदर्शन और उम्र को बेहतर बनाने के साधन उपलब्ध हों। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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