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बोरिया मजुमदार का कॉलम:टीमों की जीत-हार से ज्यादा खेल की जीत होना जरूरी है

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फीफा विश्व कप में पक्षपात के आरोपों को लेकर दुनिया दो भागों में विभाजित हो चुकी है और कई तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं। जैसे कि क्या वास्तव में अर्जेंटीना के पक्ष में फीफा का किसी तरह का झुकाव है और क्या लियोनेल मेसी को विशेष छूट देने की कोशिश की जा रही है? क्या मेसी की लोकप्रियता रेफरी और अन्य अधिकारियों को उनके तथा अर्जेंटीना के प्रति कुछ अधिक उदार बना रही है? क्या इससे प्रतियोगिता में समान अवसर का सिद्धांत प्रभावित हो रहा है? क्या कम चर्चित खिलाड़ियों वाली टीमें इसका खामियाजा भुगत रही हैं? क्या इससे टूर्नामेंट की साख पर असर पड़ रहा है और फुटबॉल समुदाय में कटुता बढ़ रही है? और क्या फीफा ने इन आशंकाओं को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं? आदि-आदि। फीफा विश्व कप जैसे आयोजन में निष्पक्ष खेल पहली आवश्यकता होती है। हालांकि रेफरिंग को लेकर आरोप कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन इस प्रतियोगिता में हुई त्रुटियों की संख्या भी कम नहीं रही है। वीडियो असिस्टेंट रेफरी (वीएआर) प्रणाली गंभीर बहस का विषय बनी हुई है और यदि निर्णयों में एकरूपता की बात करें, तो कई बड़ी चूकें गिनाई जा सकती हैं। भारत के पूर्व फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने स्पष्ट कहा है कि मिस्र के विरुद्ध खेलते हुए ईरान का जो गोल रद्द किया गया, वह अनुचित था। ईरान के साथ किए गए व्यवहार ने भी इस विवाद को और बढ़ाया। मैच खत्म होने के तुरंत बाद उसके खिलाड़ियों को मैक्सिको भेज दिया गया। शायद पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की पृष्ठभूमि में यह एक भू-राजनीतिक आवश्यकता थी। ईरान का मामला अपवाद नहीं था। अर्जेंटीना के साथ खेले गए मैचों में मिस्र और स्विट्जरलैंड के खिलाफ दिए गए निर्णय भी विवादास्पद रहे। जबकि खेलों को संदेह से परे होना चाहिए। यह एक बड़े टूर्नामेंट की बुनियादी शर्त है और इसी मोर्चे पर यह विश्व कप विवादों में घिर गया है। ट्रम्प और फीफा प्रेसिडेंट के बीच फोन पर हुई बातचीत भी पूरी तरह से गैर-जरूरी और ध्यान भटकाने वाली घटना थी। हालांकि फीफा ने स्पष्ट किया कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रेसिडेंट की कोई भूमिका नहीं होती, लेकिन इस स्पष्टीकरण से भी आम धारणाओं को लेकर कोई अच्छा संदेश नहीं गया। आखिर खेल से जुड़े किसी मुद्दे पर किसी देश के नेता और फीफा प्रेसिडेंट के बीच बातचीत की आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए? क्या इससे विपक्षी टीमों की आशंकाएं नहीं बढ़तीं? खेल में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है और यह घटना संदेह के बीज बोने के लिए पर्याप्त थी। टूर्नामेंट अब निर्णायक दौर में पहुंच चुका है और इसमें बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। फीफा को इन अंतिम कुछ मुकाबलों के लिए सर्वश्रेष्ठ रेफरियों की नियुक्ति करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर निर्णय संदेह से परे हो। वह अपनी प्रतिष्ठा पर किसी तरह का दाग नहीं लगने दे सकता। हालांकि इन आरोपों को कॉन्स्पिरेसी थ्योरी कहकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन हर बार ऐसा करना काफी नहीं होगा। इस मुद्दे पर उठ रही आवाजें लगातार तेज हो रही हैं और अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से निर्णयों में असंगति सबसे बड़ा मुद्दा रही है। उदाहरण के लिए पेनल्टी के दो मामलों को ही देखिए। एक पेनल्टी इंग्लैंड और हैरी केन के खिलाफ मैक्सिको के साथ मुकाबले में दी गई, जबकि दूसरी मिस्र के खिलाफ खेले गए मैच अर्जेंटीना के पक्ष में। यदि इन दोनों मामलों की तुलना करें, तो निर्णयों में स्पष्ट असंगति दिखाई देती है। दोनों ही ऐसे फैसले थे, जो किसी भी दिशा में जा सकते थे। मैक्सिको के मामले में तो निर्णय एज्टेका स्टेडियम में मेजबान टीम के ही पक्ष में गया था। यह समझा जा सकता है कि खेल में बड़े नामों की अनदेखी नहीं की जा सकती और खेल इन बड़े सितारों के बिना चल भी नहीं सकता। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न धारणा का है। प्रशंसकों की नजर में आपकी छवि पूरी तरह निष्पक्ष होनी चाहिए। किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और यही वह बात है, जिसे फीफा को 19 तारीख को होने वाले फाइनल से पहले सुनिश्चित करना होगा। क्या फीफा ऐसा कर पाएगा, इस सवाल का जवाब ही इस विश्व कप की विरासत तय कर सकता है। इस मुद्दे का महत्व निर्विवाद है। अंततः कौन जीतता है और कौन हारता है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि खेल की जीत हो और यह तभी संभव है, जब हर स्तर पर प्रतियोगिता संदेह से परे बनी रहे। फीफा को अंतिम कुछ मुकाबलों के लिए सर्वश्रेष्ठ रेफरियों की नियुक्ति करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर निर्णय संदेह से परे हो। वह अपनी प्रतिष्ठा पर कोई दाग नहीं लगने दे सकता। यह खेल के लिए जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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