कारोबार की दुनिया में जो थोड़े अनुभवी हैं, उम्रदराज हैं, वो शिकायत करते हैं कि नई पीढ़ी के काम करने का ढंग परेशान कर रहा है। नौकरियां तो लोग ऐसे बदलते हैं, जैसे मूंगफली निकाल के छिलका फेंक दिया जाए। इस पीढ़ी से यही शिकायत लोगों को घर में भी है। जबकि देखें तो इस सब में इस पीढ़ी का दोष नहीं है। पूरी प्रकृति या तो बदल गई या हमने बदल दी है। ऐसे में जैसे पुराने लोग रहे, उसी तरह बच्चे भी रहें, यह संभव नहीं है। जब हम इन बच्चों के साथ व्यवहार कर रहे हों तो कुछ शब्दों पर ध्यान दीजिए। नाज-नखरे : नाज का एक अर्थ गर्व भी होता है और लाड़ भी। नखरे का अर्थ है जिद। यह दोनों बातें इस पीढ़ी में जन्म से ही आ गई हैं। इसी तरह क्रोध और डांट : क्रोध में थोड़ा बदला लेने की वृत्ति होती है और डांट में बदलने की नीयत। हम बच्चों पर क्रोध करें, इससे अच्छा है कि उन्हें डांट दें। और इस पीढ़ी को लेकर माफ करने की आदत बनाइए। क्योंकि जब हम किसी को माफ करते हैं तो हमारे आसपास का वातावरण बड़ा पॉजिटिव हो जाता है। आज नहीं तो कल बच्चे उसको महसूस करेंगे।


